बिहार में ‘सुपर CM’ का साया: संवैधानिक मर्यादा से परे सत्ता का रिमोट कंट्रोल?

पटना:- बिहार की राजनीति में एक बार फिर ‘सुपर CM’   बनाम संवैधानिक व्यवस्था की बहस गरमा गई है। पूर्व CM और वर्तमान राज्यसभा सांसद नीतीश कुमार द्वारा डिप्टी CM से सीधे कामकाज की रिपोर्ट मांगे जाने की चर्चा ने न केवल संवैधानिक प्रोटोकॉल पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि सत्ता के वास्तविक केंद्र को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है।

क्या कहता है संविधान ?

संवैधानिक दृष्टिकोण स्पष्ट है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(2) के अनुसार मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति जवाबदेह होती है। मुख्यमंत्री ही प्रशासनिक प्रमुख होता है और वही अपने मंत्रियों से आधिकारिक रिपोर्ट मांग सकता है। ऐसे में किसी गैर-पदधारी – चाहे वह पूर्व मुख्यमंत्री या पार्टी अध्यक्ष ही क्यों न हो – द्वारा सरकारी रिपोर्ट या फाइलें मांगना संवैधानिक मर्यादा के दायरे से बाहर माना जाएगा। गोपनीयता की शपथ भी इस पूरी व्यवस्था की आधारशिला है, जिसका उल्लंघन गंभीर सवाल खड़े करता है।

लेकिन वास्तविक राजनीति का गणित अक्सर संविधान की किताब से अलग चलता है- खासतौर पर गठबंधन सरकारों में। यहां ‘मार्गदर्शन’ के नाम पर समानांतर सत्ता केंद्र उभरना कोई नई बात नहीं है। नीतीश कुमार की ताजा सक्रियता इसी दिशा में एक संकेत मानी जा रही है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक अनिश्चितता और रणनीतिक लचीलेपन के लिए जाने जाते हैं। कैमरे के सामने दिए गए उनके बयान को महज औपचारिक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक सशक्त राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है-कि भले ही वह अब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर न हों या राज्यसभा में सक्रिय हों, लेकिन बिहार की ब्यूरोक्रेसी और गवर्नेंस पर उनकी पकड़ अभी भी कायम है। उनकी बातों को नजरअंदाज करना सत्ताधारी ढांचे के लिए जोखिम भरा हो सकता है।

जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोड़ा और सत्ता भाजपा के सम्राट चौधरी के हाथों में गई, तब NDA नेताओं ने साफ कहा था कि सरकार नीतीश कुमार के ‘मार्गदर्शन‘ में चलेगी। अब उसी ‘मार्गदर्शन’ की व्याख्या बदलती नजर आ रही है-जो सीधे ‘माॅनिटरिंग’ और ‘रिपोर्टिंग’ तक पहुंच चुकी है।

सूत्रों के मुताबिक, विजय चौधरी को सरकार और नीतीश कुमार के बीच एक ‘ब्रिज‘ की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसके जरिए कैबिनेट के फैसलों की ‘प्रोग्रेस रिपोर्ट’ सीधे पूर्व मुख्यमंत्री तक पहुंच रही है। यह संकेत देता है कि जेडीयू अपने एजेंडे और नियंत्रण को कमजोर नहीं पड़ने देना चाहती।

इस पूरी कवायद के पीछे एक बड़ा राजनीतिक डर भी छिपा हुआ है-क्षेत्रीय दलों के टूटने और कमजोर होने का खतरा। देश की राजनीति में हाल के वर्षों में कई उदाहरण सामने आए हैं, जहां बड़े राष्ट्रीय दलों के साथ गठबंधन करने वाले क्षेत्रीय दल धीरे-धीरे बिखर गए।

महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) का विभाजन, कर्नाटक में जनता दल (सेकुलर) का सीमित होता प्रभाव, बिहार में लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) का 2021 में टूटना, और पंजाब में शिरोमणि अकाली दल का कमजोर होता जनाधार-ये सभी उदाहरण इस आशंका को मजबूत करते हैं कि गठबंधन की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व लगातार चुनौती में है।

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बिहार में जेडीयू किसी संभावित टूट को रोकने के लिए ‘केंद्रीकृत नियंत्रण’ की रणनीति अपना रही है? क्या ‘सुपर CM’ की भूमिका दरअसल राजनीतिक अस्तित्व बचाने का एक तरीका है?

इतिहास भी इस बहस को मजबूती देता है। 2014 में जीतन राम मांझी के मुख्यमंत्री रहते हुए फैसलों पर ‘7-सर्कुलर रोड’ से अंतिम मंजूरी मिलने के आरोप लगे थे। मांझी ने खुद कहा था कि उन्हें स्वतंत्र निर्णय लेने की पूरी छूट नहीं थी। यहां तक कि कैबिनेट मंत्रियों द्वारा मुख्यमंत्री की बैठक का बहिष्कार कर सीधे नीतीश कुमार को रिपोर्ट देने की घटनाएं भी सामने आई थीं।

वर्तमान स्थिति:-

आज की स्थिति फिर वही सवाल खड़ा करती है-क्या बिहार में सत्ता का असली केंद्र मुख्यमंत्री कार्यालय है, या कोई ‘अनौपचारिक शक्ति केंद्र‘? क्या संवैधानिक ढांचा केवल औपचारिकता बनकर रह गया है, या गठबंधन की मजबूरियां इसे लगातार कमजोर कर रही हैं?

नीतीश कुमार के ताजा तेवर एक बात तो साफ कर रहे हैं-भले ही वह कुर्सी पर न हों, लेकिन बिहार की सत्ता का ‘रिमोट कंट्रोल’ अभी भी उनके हाथ में है। ‘सुपर CM’ की यह भूमिका न केवल मौजूदा सरकार, बल्कि पूरे राजनीतिक संतुलन के लिए एक बड़ा संकेत है।

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