गौ-पालन बनाम गौ-पूजन : Savarkar, संविधान और गौ-वध पर फजीहत!

कोलकाता :- पश्चिम बंगाल में नई नवेली भाजपा की सरकार ने गौ-वध पर 14 वर्ष की उम्र का नया तकाजा पेश करते हुए, एक बार फिर गाय को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है। पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने राज्य में गोवंश को लेकर बड़ा बयान दिया है। शनिवार को उन्होंने कहा – राज्य में कानून के अनुसार गोवंश परिवार के किसी भी ऐसे पशु को काटा नहीं जाएगा जिसकी उम्र 14 वर्ष से कम हो।

अन्य राज्यों में यह नियम या तो मौजूद नहीं है, कम सख्त है या अलग रूप में लागू है, लेकिन बंगाल में यह स्पष्ट रूप से लागू है। उन्होंने पूर्व की सरकार पर हमला करते हुए कहा कि यह नियम पिछली सरकार के कार्यकाल में भी था, हालांकि किसी ने इसे लागू नहीं किया। शायद अपने वोट बैंक को सुरक्षित रखने के लिए ऐसा किया गया हो। इस मौके पर उनके साथ मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी मौजूद थे। परन्तु आज विनायक दामोदर सावरकर के जन्मदिवस पर गौ-वध से जुड़े इस नीति ने एक नया विवाद को जन्म दिया है। यह विवाद सनातनी हिंदुओं के गौ-माता के मान्यता को आहत कर रहा है। ऐसा इसलिए कि जो भाजपा (BJP) हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र की बात कह कर सत्ता में आई वो भाजपा आज रामराज्य के मूल सिद्धांत से भटककर, सावरकर की तर्कवादी (rationalist) और उपयोगितावादी (utilitarian) विचारधारा को अपना रही है।

सावरकर का गाय के प्रति ये मान्यताः-

सावरकर का गाय के प्रति ये मान्यता कहती है कि – गाय को केवल “पवित्र” मानकर उसकी पूजा करना तर्कसंगत नहीं है। यह एक सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक विषय है, न कि अंध-धार्मिक। यदि किसी राष्ट्र या सेना के अस्तित्व पर संकट हो-जैसे युद्ध या भुखमरी-तो जीवन रक्षा सर्वोपरि है। ऐसी स्थिति में गोमांस खाना या गाय का वध करना गलत नहीं माना जाना चाहिए, यदि उससे लोगों की जान बचती हो

सावरकर अपनी इस विचारधारा में राष्ट्र और उसकी सुरक्षा धार्मिक परंपराओं से ऊपर रखा है। यह दृष्टिकोण उनकी Hindutva की सोच के एक पहलू को भी दिखाता है, जहाँ: “हिंदुत्व” को उन्होंने सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान के रूप में देखा, न कि केवल धार्मिक आस्था के रूप में। जबकि सनातन संस्कृति के अनुयायियों की मान्यता बिल्कुल उलट है, और तो और वर्तमान भारत में हिंदुत्व को न मानने वाले गैर सनातनी लोग ईद-उल-अज़हा (बकरीद) के नमाज के दौरान बिहार, पश्चिम बंगाल एवं अन्य राज्यों में सड़कों पर उतर गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग की है।

संविधान का अनुच्छेद 48 क्या कहता हैः-

इसके साथ हीं भारतीय संविधान की अनुच्छेद 48 गौवंश (गाय-बछड़ों) और दुधारू पशुओं के वध पर प्रतिबंध का अनुशंसा करती है। इन संवैधानिक, धार्मिक आस्था और सामाजिक समन्वय के बावजूद भी यदि केंद्र और राज्य सरकार गौ-वध निषेध पर खामोश बैठती है, तब यह बहस केवल इतिहास या विचारधारा तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि-संविधान, धार्मिक आस्था और सामाजिक समन्वय के त्रिकोण में बदल जाएगी, और भाजपा के मूल अवधारणाओं को धिक्कारेगी

क्या भाजपा अपने मूल आधार से भटक चुकी है? क्या भाजपा केवल साम्राज्यवादी ताकतों में उलझ चुकी है, जिसे अपना मूल सिद्धांत दिखाई नहीं दे रहा है?

क्या भाजपा के लोग गाय को माता नहीं मानते हैं? क्या भाजपा तर्कवाद और उपयोगितावाद के सिद्धांतों से एक नई राजनीतिक विचार को जन्म देना चाहती है? क्या तर्कवाद और उपयोगितावाद का सिद्धांत मनुष्य जाति पर भी लागू होगा? इस तरह के असंख्य प्रश्न आम जन मानस के मन में उठ रहें हैं। इन प्रश्नों का सार यही है कि क्या भारत इस संवेदनशील मुद्दे पर सहमति का रास्ता निकाल पाएगा, या यह बहस और गहरी होती जाएगी?

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