पटना :- राजधानी स्थित बांकीपुर विधान सभा क्षेत्र में हुए उपचुनाव का परिणाम ने बिहार की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। इस चुनाव में नव उदित पार्टी जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने बाजी मारी है। बांकीपुर जो कभी भाजपा का अभेद्य किला माना जाता रहा है, उसका विधायक बीजेपी के नवनियुक राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और उनके पिता स्व. नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा रहे। उस बांकीपुर से निकल नितिन नवीन, कार्यकर्ता के मामले में दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, लेकिन जैसे हीं वे बांकीपुर से निकले उनके हाथ से बांकीपुर भी निकल पड़ा। अब इस क्षेत्र का नेतृत्व की जिम्मेदारी जनता ने चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर को सौंप दी है। पीके के इस उभार ने बिहार की राजनीति को नया त्रिकोणीय मोड़ दे दिया है। यह त्रिकोण किसपर कितना भारी पड़ने वाला है , आगे इस आलेख में जानते हैं।
बिहार के केंद्र में बैठी बीजेपी और जदयू, नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को ‘पार्ट टाइम पॉलिटिशियन’ कह कर बुलाने लगी है। बांकीपुर उपचुनाव का नतीजा और पिछले नौ महीने का घटनाक्रम इस संदर्भ को साबित भी करता दिख रहा है।
सात घटनाएं, एक पैटर्न
बीते नौ महीनों में कम से कम सात मौके ऐसे आए जब तेजस्वी यादव अहम राजनीतिक पलों से गायब रहे या उन पर उदासीन नजर आए। बांकीपुर उपचुनाव के नतीजों के दिन वे पटना से दूर सोनपुर के हरिहर नाथ मंदिर के श्रावण के पहले सोमवार के दिन पूजा करते नजर आए और चुनाव पर टिप्पणी करने से बचते दिखे। चुनाव तारीखों के ऐलान वाले दिन वे परिवार के साथ विदेश रवाना हो गए और प्रचार के आखिरी दो दिन एक रोड सो में नजर आए । इसी दौरान विधानसभा का मानसून सत्र चला, जिसमें उन्होंने एक दिन भी हिस्सा नहीं लिया।
दिल्ली में NEET पेपर लीक को लेकर जब राहुल गांधी और अखिलेश यादव सड़क पर उतरे, तेजस्वी और उनकी पार्टी सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित रही। राज्यसभा चुनाव में पार्टी उम्मीदवार की हार और विधायकों की बगावत के बीच वे कोलकाता रवाना हो गए। नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव में करारी हार (सिर्फ 25 सीटें) के बाद भी वे लंबे समय के लिए सार्वजनिक जीवन से दूर हो गए, और सत्र शुरू होने के अगले ही दिन परिवार के साथ यूरोप टूर पर निकल गए, और एक महीने बाद लौटे।
खुद उनकी बहन रोहिणी आचार्य ने भी बिना नाम लिए तंज कसा – उनका इशारा साफ था कि राजनीति में जीत उसी को मिलती है जो लगातार जमीन पर सक्रिय रहता है और जनता व कार्यकर्ताओं से जुड़ाव बनाए रखता है।
MY समीकरण पर संकट के बादल
तेजस्वी के सामने सबसे बड़ी चुनौती RJD के परंपरागत मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण को बचाए रखने की है। मुस्लिम मतदाता लालू परिवार के साथ तभी तक जुड़े रहते हैं जब तक उन्हें लगता है कि यही भाजपा को रोकने का सबसे मजबूत विकल्प है। बांकीपुर में जैसे ही यह भरोसा प्रशांत किशोर की तरफ शिफ्ट हुआ, RJD की जमानत तक जब्त हो गई। इससे पहले सीमांचल में भी मुस्लिम मतदाताओं ने असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM को तरजीह दी थी। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो अगर आगे भी यही धारणा बनी, कि तेजस्वी भाजपा को चुनौती देने में सक्षम नहीं हैं, तो मुस्लिम वोट बैंक प्रशांत किशोर की ओर खिसक सकता है – जिससे MY समीकरण बिखरने का खतरा है।
यादव वोट बैंक भी बिना शर्त तेजस्वी के साथ बना रहेगा, यह मान लेना जल्दबाजी होगी। सत्ता से दूर रहने पर स्थानीय प्रशासनिक पकड़ और आर्थिक फायदे कमजोर पड़ते हैं, और बांकीपुर के कुछ इलाकों में यादव मतदाता तेजस्वी की बैकफुट वाली राजनीति से नाराज होकर प्रशांत किशोर की तरफ मुड़ते भी दिखे।
BJP के लिए PK खतरा जरूर, पर तेजस्वी से कम
चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर, से भाजपा को, तेजस्वी की तुलना में कम खतरा है। इसकी वजह है भाजपा की कोर्स-करेक्शन क्षमता- पार्टी हार के तुरंत बाद जमीनी फीडबैक लेकर रणनीति और उम्मीदवार बदलती रही है, जैसा 2022 के बोचहां उपचुनाव के बाद देखने को मिला था। इसके उलट, हार के बाद भी तेजस्वी न तो ठीक से समीक्षा बैठक करते हैं, न सक्रियता दिखाते हैं।
भाजपा का कोर वोटर (सवर्ण-वैश्य) सिर्फ विकास नहीं, बल्कि हिंदुत्व और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसी वैचारिक प्रतिबद्धता से भी जुड़ा है, जबकि जन सुराज के पास अभी कोई स्पष्ट वैचारिक ढांचा नहीं है। साथ ही भाजपा के पास बूथ स्तर तक अनुशासित कैडर है, जो सिर्फ एक उपचुनाव में हार से बिखरने वाला नहीं दिखता।इसके बावजूद भाजपा को तीन मोर्चों पर सतर्क रहना होगा – नीतीश कुमार की सेहत को देखते हुए JDU के वोट शेयर को दहाई अंक में बनाए रखना, न्यूट्रल/फ्लोटिंग वोटरों (शहरी युवा, मध्यम वर्ग) को ठोस रोजगार और औद्योगिक नीतियों से साधना, और सबसे अहम – यह समझना कि बिहार की आधी से ज्यादा आबादी 35 साल से कम उम्र की है, जिसने 1990 के दशक का ‘जंगलराज’ देखा नहीं या जिन्होंने देखा उन्हें स्मरण नहीं। इस पीढ़ी के लिए पुराना डर अब चुनावी हथियार नहीं रह गया; शिक्षा, रोजगार और प्रति व्यक्ति आय जैसे मुद्दे ज्यादा मायने रखते हैं, और यहीं प्रशांत किशोर अपनी पदयात्रा के जरिए सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं।
बिहार की राजनीति एक अहम मोड़ पर खड़ी है। तेजस्वी यादव की सक्रियता में कमी सिर्फ छवि का सवाल नहीं, बल्कि RJD के सामाजिक आधार के लिए सीधा खतरा बनती जा रही है। वहीं भाजपा के लिए प्रशांत किशोर उतना तात्कालिक खतरा नहीं जितना उसकी अपनी नीतिगत सुस्ती हो सकती है। कुल मिलाकर, अगला विधानसभा चुनाव इस बात पर टिका होगा कि कौन सी पार्टी मतदाताओं के बदलते मिजाज – खासकर युवा और न्यूट्रल वोटर – को सबसे तेजी से पढ़ती और उसके हिसाब से खुद को ढालती है।


