बिहार में पहला LPG शवदाह गृह, पर्यावरण के साथ ऊर्जा चिंता भी

पटना:- बिहार की राजधानी स्थित दीघा घाट पर प्रस्तावित बिहार का पहला LPG आधारित शवदाह गृह आधुनिक और पर्यावरण अनुकूल व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस परियोजना के तहत लकड़ी पर निर्भरता कम कर स्वच्छ दाह प्रक्रिया को बढ़ावा देने की योजना है, साथ ही पारंपरिक धार्मिक विधियों को भी आंशिक रूप से बनाए रखने का प्रयास किया गया है।

लेकिन इस पहल का व्यापक विश्लेषण करने पर ऊर्जा आपूर्ति और नीतिगत समन्वय से जुड़े गंभीर सवाल सामने आते हैं।

पहला पहलू वैश्विक ऊर्जा संकट से जुड़ा है। यदि अमेरिका-इजराइल-ईरान जैसे भू-राजनीतिक तनाव लंबे समय तक बने रहते हैं या युद्ध की स्थिति गहराती है, तो इसका सीधा असर कच्चे तेल और LPG की वैश्विक आपूर्ति पर पड़ सकता है। भारत, जो इन संसाधनों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, ऐसे परिदृश्य में LPG की उपलब्धता और कीमत, दोनों संकट में आ सकती है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि आपूर्ति बाधित होती है, तो इस तरह के एलपीजी आधारित शवदाह गृहों का संचालन कैसे सुनिश्चित होगा।

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू बिहार के इथेनॉल उद्योग से जुड़ा है। क्योंकि राज्य में स्थापित इथेनॉल प्लांट आज बंद होने के कगार पर हैं, जिसका मुख्य कारण उत्पादन नहीं, बल्कि बाजार की कमी है। केंद्र स्तर पर तेल कंपनियों और इथेनॉल उत्पादकों के बीच लगभग 40% इथेनॉल मिश्रण/खरीद को लेकर सहमति बनी थी, लेकिन व्यवहार में तेल कंपनियां बिहार में उत्पादित इथेनॉल की खरीद नहीं कर रही हैं।

इसका परिणाम यह हुआ है कि उत्पादन क्षमता होने के बावजूद उद्योग ठप होने की स्थिति में पहुंच गया है, जिससे निवेश, रोजगार और वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में राज्य को बड़ा झटका लग रहा है।

विरोधाभास  की स्थितिः-

यह स्थिति एक बड़ा विरोधाभास सामने लाती है, ऐसा इसलिए कि एक तरफ राज्य और देश वैकल्पिक एवं स्वच्छ ईंधनों की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इसके लिए पूर्ण तैयारी नहीं है। बाजार में जिस प्रकार LPG का संकट है, और लोग इस संकट से उबरने के लिए परंपरागत रूप से लकड़ी और गोयठा (कंडे) का सहारा ले रहे हैं, तो क्या शवदाह के लिए LPG का मिलना कितना आसान होगा, ये विचारणीय है। यदि इन बातों पर विचार न किया गया तो, इस परियोजना का भी वही हाल होगा जो पहले से उपलब्ध इथेनॉल जैसे विकल्प को बाजार नहीं मिल पाने से इथेनॉल उद्योग के साथ हो रहा है।

यदि इथेनॉल उद्योग को प्रभावी रूप से जोड़ा जाता, तो यह न केवल पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करने में सहायक होता, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति के विविधीकरण के जरिए ऐसे संकटों से निपटने में भी मददगार साबित हो सकता था।

इस परिप्रेक्ष्य में पटना का LPG शवदाह गृह एक प्रगतिशील लेकिन आंशिक रूप से जोखिमपूर्ण मॉडल के रूप में सामने आता है। जहां यह पर्यावरणीय दृष्टि से बेहतर विकल्प है, वहीं इसकी सफलता काफी हद तक बाहरी ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भर है- जो वैश्विक और नीतिगत दोनों स्तरों पर अनिश्चित बनी हुई है।

निष्कर्षत, यह परियोजना केवल शहरी सुविधा का विषय नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा नीति, बाजार संरचना और आपूर्ति सुरक्षा से जुड़ा एक बड़ा संकेत भी देती है। यदि भविष्य में LPG की कमी होती है, तो अंतिम संस्कार जैसी मूलभूत सेवा भी प्रभावित हो सकती है- और यही इस पूरे मॉडल की सबसे बड़ी चिंता बनकर उभरती है।

ये भी पढ़ेः-

Related Posts

Women’s Reservation से जुड़े तीन विधेयकों पर फिर होगी सदन में चर्चा

नई दिल्ली:- लोकसभा में आज Women’s Reservation को लागू करने की दिशा में अहम माने जा रहे तीन महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा फिर से शुरू होगी। इनमें संविधान (143 संशोधन)…

Women Empowerment अधिनियम पर फोकस: संसद का विशेष सत्र आज से

नई दिल्लीः-  संसद के विस्तारित बजट सत्र के तहत तीन दिन का विशेष अधिवेशन आज से शुरू हो गया है, जो 18 अप्रैल तक चलेगा। इस सत्र में सरकार का…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *