गुजरात में UCC की पहल से फिर गरमाई राजनीति

लखनऊः– देश में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर एक बार फिर माहौल गरम हो गया है। गुजरात सरकार की ओर से इस दिशा में कदम बढ़ाने के बाद यह मुद्दा फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गया है। इससे पहले उत्तराखण्ड UCC लागू करने वाला पहला राज्य बन चुका है, और अब गुजरात की पहल को इस बहस का अगला बड़ा पड़ाव माना जा रहा है।

UCC क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?

UCC का सीधा अर्थ है- सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक कानून। यानी विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में धर्म आधारित अलग-अलग पर्सनल लॉ की जगह एक समान कानून लागू करना। मौजूदा समय में भारत में अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग नियम लागू हैं, जिससे कई बार कानूनी जटिलताएं भी पैदा होती हैं।

गुजरात में प्रस्तावित व्यवस्था का मकसद इन सभी कानूनों को एक समान ढांचे में लाना है, ताकि कानून के सामने सभी नागरिक बराबर हों। हालांकि, इसमें अनुसूचित जनजातियों (ST) को बाहर रखने की बात भी सामने आई है, जैसा कि अन्य राज्यों के मॉडल में देखा गया है।

संविधान में UCC की जगहः-

समान नागरिक संहिता का जिक्र भारतीय संविधान के Article 44  में किया गया है। यह नीति निर्देशक तत्व (DPSP) का हिस्सा है, जो सरकार को यह सुझाव देता है कि वह नागरिकों के लिए समान कानून लागू करने की दिशा में काम करे। हालांकि, यह बाध्यकारी नहीं है, यानी इसे लागू करना सरकार के विवेक पर निर्भर करता है।

संविधान सभा में इस मुद्दे पर लंबी बहस हुई थी। B. R. Ambedkar ने इसे सामाजिक समानता की दिशा में जरूरी कदम बताया, लेकिन साथ ही यह भी माना कि देश की विविधता को देखते हुए इसे लागू करने में समय और सहमति जरूरी होगी। K. M. Munshi और Alladi Krishnaswamy Ayyar जैसे नेताओं ने भी एक समान कानून के पक्ष में तर्क दिए थे, जबकि कुछ सदस्यों ने इसे धार्मिक अधिकारों के खिलाफ बताया था।

पक्ष और विपक्ष: तर्क क्या कहते हैं?

UCC के समर्थन में सबसे बड़ा तर्क “समानता” का है। समर्थकों का मानना है कि एक समान कानून से सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार मिलेगा, खासकर महिलाओं को। विवाह और संपत्ति जैसे मामलों में महिलाओं के अधिकार मजबूत होंगे। साथ ही, अलग-अलग पर्सनल लॉ की जटिलता खत्म होने से कानूनी प्रक्रिया भी सरल हो जाएगी।

वहीं, विरोध करने वालों की चिंता अलग है। उनका कहना है कि भारत जैसे विविधता भरे देश में एक ही कानून लागू करना धार्मिक स्वतंत्रता पर असर डाल सकता है। कई अल्पसंख्यक समुदाय इसे अपनी परंपराओं और पहचान के लिए चुनौती मानते हैं। कुछ राजनीतिक दल इसे संवेदनशील मुद्दा बताते हुए व्यापक संवाद की जरूरत पर जोर देते हैं।

राजनीति और आगे की दिशाः-

UCC लंबे समय से देश की राजनीति का अहम मुद्दा रहा है। सत्ताधारी दल इसे “एक देश-एक कानून” की दिशा में बड़ा कदम मानता है, जबकि विपक्ष अक्सर इसे सामाजिक सहमति के बिना लागू करने के खिलाफ नजर आता है।

गुजरात की इस पहल के बाद यह सवाल फिर उठने लगा है कि क्या आने वाले समय में अन्य राज्य भी इसी राह पर चलेंगे या केंद्र सरकार इसे पूरे देश में लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाएगी।

गौरतलब है कि,  समान नागरिक संहिता केवल एक कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक ढांचे से जुड़ा बड़ा मुद्दा है। इसमें समानता, अधिकार, परंपरा और राजनीति सभी  का संतुलन जरूरी है। ऐसे में साफ है कि UCC पर आगे की राह आसान नहीं होगी, और इस पर व्यापक चर्चा और सहमति की जरूरत बनी रहेगी।

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Meraj Ansari

Mohammad Meraj Graduation In Economics From Delhi University PG In Public Administration From BBAU Lucknow Expert areas- Rular and Urban development areas,local administrative structure, public policy structure nd Policy making nd regional political content writer.

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