पटना :- बिहार विधान परिषद की 10 सीटों के लिए हो रहे चुनाव ने NDA के अंदरूनी शक्ति संतुलन को एक बार फिर उजागर कर दिया है। 9 नियमित और 1 उपचुनाव वाली इन सीटों के लिए नामांकन प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा उस एक सीट को लेकर है, जो अब तक गठबंधन के भीतर खींचतान का केंद्र बनी हुई है।
भाजपा और जदयू ने अपने-अपने कोटे की चार-चार सीटों पर उम्मीदवार उतारकर यह साफ कर दिया है कि गठबंधन में उनकी पकड़ पहले की तरह मजबूत है। भाजपा ने जहां भोजपुरी अभिनेता पवन सिंह समेत चार नामों पर मुहर लगाई, वहीं जदयू ने भी नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार समेत अपने चार प्रत्याशी घोषित कर दिए। इसके अलावा चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने भी एक सीट पर दावा ठोकते हुए उम्मीदवार उतार दिया है।
ऐसे में सबसे बड़ा झटका उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) को लगा है, जिसे इस बार गठबंधन में कोई जगह नहीं मिली। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब यह देखा जाए कि कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश, जो वर्तमान में पंचायती राज मंत्री हैं, अब तक किसी भी सदन के सदस्य नहीं बन पाए हैं। संवैधानिक प्रावधान के अनुसार मंत्री बनने के छह महीने के भीतर विधानमंडल का सदस्य होना जरूरी होता है, लेकिन अब उनके सामने समय और राजनीतिक समर्थन – दोनों की चुनौती खड़ी हो गई है।
क्या है माजरा ?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ एक सीट का मामला नहीं, बल्कि एनडीए (NDA) में उपेंद्र कुशवाहा की घटती सियासी हैसियत का संकेत है। जब सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही सत्ता समीकरण बदले, तभी यह अंदेशा जताया जाने लगा था कि कुशवाहा की भूमिका सीमित हो सकती है।
दिलचस्प बात यह है कि कभी राज्यसभा की दौड़ में पवन सिंह को पीछे छोड़कर उपेंद्र कुशवाहा को तरजीह दी गई थी, जिसे उनके समर्थकों ने बड़ी जीत बताया था। लेकिन अब वही पवन सिंह एमएलसी (MLC) बनने की राह पर हैं और राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह रास्ता कहीं न कहीं दीपक प्रकाश की कीमत पर बना है।
सवाल उठता है कि क्या भाजपा ने रालोमो के विलय से इनकार करने का ‘राजनीतिक दंड’ दिया है? या फिर यह सिर्फ बदलते समीकरणों का परिणाम है?
फिलहाल स्थिति यह है कि एनडीए के पास 8 सीटें आराम से जीतने का गणित है, क्योंकि 1 MLC के लिए 25 विधायकों का समर्थन चाहिए और NDA के पास 202 विधायक हैं। बची हुई सीट पर सहयोगी दल LJP(R) का दावा इसलिए मजबूत दिख रहा है कि उनके एकमात्र उम्मीदवार मुस्लिम समाज से आते हैं। ऐसे में उपेंद्र कुशवाहा के लिए अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है।
आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि कुशवाहा एनडीए में अपनी जगह बचा पाते हैं या बिहार की राजनीति में उनकी भूमिका धीरे-धीरे सीमित होती चली जाएगी।
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