बिहार को केंद्र का झटका : गेहूं खरीद के लक्ष्य में 91% की कटौती

पटना :-बिहार राज्य में इस वर्ष गेहूं उत्पादन का अनुमान करीब 73 लाख मीट्रिक टन (MT) है, जो कृषि क्षेत्र के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। लेकिन इस उपलब्धि के साथ एक गंभीर विरोधाभास भी सामने आया है। केंद्र सरकार ने बिहार में गेहूं खरीद के लक्ष्य को पिछले वर्ष की तुलना में 91 प्रतिशत घटाकर महज 18 हजार MT कर दिया है। ऐसे में यह आशंका गहरा गई है कि बड़ी संख्या में किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का लाभ नहीं उठा पाएंगे।

उत्पादन बढ़ा, लेकिन खरीद घटी

बिहार में रबी फसल गेहूं का बेहतर उत्पादन का अनुमान है, वहीं दूसरी ओर सरकारी खरीद का लक्ष्य बेहद सीमित कर दिया गया है। पिछले वर्ष जहां 2 लाख MT गेहूं खरीदने का लक्ष्य था, इस बार उसे घटाकर सिर्फ 18 हजार MT कर दिया गया है। यानी कुल उत्पादन के मुकाबले सरकारी खरीद का हिस्सा नगण्य रह गया है। यह स्थिति साफ संकेत देती है कि अधिकांश किसानों को अपनी उपज खुले बाजार में बेचनी पड़ेगी, जहां उन्हें एमएसपी से कम कीमत मिलने की पूरी संभावना है। कुछ ऐसा भी हो सकता है कि बाजार के अभाव में किसानों की मेहनत बेकार चली जाए, और उचित मूल्य के अभाव में गेहूं सड़ जाए।

 केंद्र का तर्क और उठते सवा

केंद्र सरकार का कहना है कि राज्य में पिछले वर्षों में गेहूं की खरीद अपेक्षाकृत कम रही, इसलिए इस बार लक्ष्य घटाया गया है। लेकिन यह तर्क कई सवाल खड़े करता है। यदि खरीद कम हुई, तो इसके पीछे की वजह क्या थी? क्या खरीद केंद्रों की कमी थी, या भुगतान व्यवस्था में खामियां थीं?

विशेषज्ञों का मानना है कि इन समस्याओं को दूर करने के बजाय लक्ष्य घटाना किसानों के हितों के खिलाफ है। जब उत्पादन बढ़ा है, तो खरीद लक्ष्य भी उसी अनुपात में बढ़ना चाहिए था।

 MSP में बढ़ोतरी, लेकिन जमीनी फायदा सीमित

इस वर्ष सरकार ने गेहूं के MSP में 160 रुपये की बढ़ोतरी करते हुए इसे 2585 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है। लेकिन ज्यादातर जिलों में बाजार भाव इससे कम है। ऐसे में किसानों के पास MSP पर बेचने का विकल्प तभी होगा, जब सरकारी खरीद पर्याप्त हो। कम खरीद लक्ष्य के कारण यह संभावना कम हो गई है कि सभी किसान एमएसपी का लाभ उठा पाएंगे। इससे एमएसपी की उपयोगिता पर भी सवाल उठने लगे हैं।

 खरीद की धीमी शुरुआत, तेज निष्कर्ष

एक अप्रैल से पैक्स, व्यापार मंडलों और भारतीय खाद्य निगम (FCI) के माध्यम से खरीद शुरू हो चुकी है। शुरुआती एक सप्ताह में ही कुल लक्ष्य का 17 प्रतिशत गेहूं खरीदा जा चुका है। यह दर्शाता है कि किसान MSP पर बिक्री के लिए उत्सुक हैं। लेकिन लक्ष्य सीमित होने के कारण यह खरीद जल्दी ही पूरी हो जाएगी। इसके बाद शेष किसानों को बाजार के भरोसे रहना पड़ेगा, जहां कीमतें पहले से ही कम हैं।

एजेंसियों की सीमित क्षमता

इस वर्ष पैक्स को 13.5 हजार एमटी और एफसीआई को 4.5 हजार एमटी खरीद का लक्ष्य दिया गया है। कुल मिलाकर 18 हजार एमटी की खरीद होनी है। ग्रामीण स्तर पर पैक्स किसानों के लिए सबसे सुलभ माध्यम हैं, लेकिन सीमित लक्ष्य के कारण वे अधिक किसानों को लाभ नहीं दे पाएंगे।

किसानों पर आर्थिक असर

इस निर्णय का सबसे अधिक असर छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ेगा। जिनके पास भंडारण की सुविधा नहीं होती, वे तुरंत फसल बेचने को मजबूर होते हैं। ऐसे में उन्हें कम कीमत पर ही सौदा करना पड़ता है।सरकारी खरीद सीमित होने से बिचौलियों की भूमिका भी बढ़ेगी, जो किसानों से कम दाम पर खरीद कर मुनाफा कमाते हैं। इससे किसानों की आय पर नकारात्मक असर पड़ेगा।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार ने खरीद लक्ष्य में वृद्धि नहीं की, तो बड़ी संख्या में किसान MSP से वंचित रह जाएंगे। उनका कहना है कि उत्पादन और खरीद के बीच संतुलन बनाना जरूरी है, अन्यथा यह स्थिति किसानों के लिए आर्थिक संकट बन सकती है।

नीति पर पुनर्विचार की जरूरत

बिहार में इस वर्ष गेहूं उत्पादन एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन खरीद लक्ष्य में भारी कटौती ने इस सफलता को अधूरा बना दिया है। MSP में वृद्धि के बावजूद उसका लाभ तभी मिलेगा, जब सरकार पर्याप्त खरीद सुनिश्चित करे।

ऐसे में जरूरी है कि केंद्र और राज्य सरकार इस फैसले पर पुनर्विचार करें और किसानों के हित में खरीद लक्ष्य बढ़ाएं। अन्यथा, यह स्थिति न केवल किसानों की आय को प्रभावित करेगी, बल्कि कृषि क्षेत्र में असंतोष भी बढ़ा सकती है।

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