पटना:- Bihar BJP की राजनीति में एक बड़े बदलाव के बीच सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही विवादों और आरोपों से घिरा हुआ भी। उनके राजनीतिक सफर में जहां विरासत और रणनीति की भूमिका रही है, वहीं पुराने मामलों और हालिया आरोपों ने उनकी छवि पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
सम्राट चौधरी को लेकर यह धारणा लंबे समय से रही है कि वे अपने पिता शकुनि चौधरी की राजनीतिक शैली – दल-बदल और सत्ता समीकरणों के अनुसार खुद को ढाल आगे बढ़ते रहे हैं। लेकिन अब उनके सामने केवल राजनीतिक आलोचना ही नहीं, बल्कि गंभीर आपराधिक आरोप भी चर्चा के केंद्र में आ गए हैं।
प्रशांत किशोर के नए और गंभीर आरोपः-
हालिया विधान सभा चुनाव के दिनों में प्रशांत किशोर ने सम्राट चौधरी पर बेहद संगीन आरोप लगाए हैं, जिससे बिहार की राजनीति में हलचल तेज हो गई थी।
प्रशांत किशोर का दावा है कि सम्राट चौधरी 1995 के तारापुर हत्याकांड (कांड संख्या 44/1995) में अभियुक्त रहे हैं, जिसमें छह लोगों की हत्या हुई थी। उन्होंने कहा कि सभी मृतक कुशवाहा जाति के थे और यह मामला उन नेताओं के लिए भी सवाल खड़ा करता है, जो जातीय राजनीति करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि – सम्राट चौधरी खुद को कुशवाहा बताते हैं, लेकिन छह कुशवाहा नेताओं की हत्या के मामले में अभियुक्त रहे हैं।
उम्र का विवाद और कानूनी सवालः-
प्रशांत किशोर ने इस मामले को सम्राट चौधरी की उम्र से जुड़े विवाद से भी जोड़ा। उनके अनुसार, सम्राट ने अदालत में बिहार विद्यालय परीक्षा समिति का जो एडमिट कार्ड जमा किया था, उसमें उनका नाम “सम्राट चंद्र मौर्य”, पिता का नाम “शकुनी चौधरी” और जन्मतिथि 01-05-1981 दर्ज थी। इस आधार पर 1995 में उनकी उम्र 14 साल होती है, जिससे उन्हें नाबालिग मानकर राहत मिली थी। लेकिन प्रशांत किशोर ने सवाल उठाया कि यदि 2020 के चुनावी हलफनामे में दी गई उम्र (51 वर्ष) को सही माना जाए, तो 1995 में उनकी उम्र 20-25 वर्ष के बीच होनी चाहिए थी। इस स्थिति में वे नाबालिग नहीं बल्कि वयस्क माने जाते और मामला अभियोजन के दायरे में आता।प्रशांत किशोर ने इसे गंभीर आरोप बताते हुए कहा कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। प्रशांत किशोर ने गृह मंत्री अमित शाह से इस मामले की जांच को लेकर अपील भी किया था ।
तीन जन्मतिथि – से शुरू होकर विवादों तकः-
सम्राट चौधरी का नाम पहले भी कई विवादों में रहा है, जिनमें सबसे चर्चित मामला उनकी उम्र को लेकर रहा। अलग-अलग दस्तावेजों में उनकी तीन जन्म तिथियां सामने आने के बाद उन्हें कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर नुकसान उठाना पड़ा।
भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उनका चुनाव रद्द किया जाना और 1999 में राबड़ी देवी सरकार में मंत्री पद से “अल्पायु” के आधार पर हटाया जाना इस विवाद के बड़े उदाहरण हैं। जिसका जिक्र बार बार प्रशांत किशोर ने भी किया है।
पहले भी लगे गंभीर आरोपः-
इसी क्रम में प्रशांत किशोर ने यह भी आरोप लगाया कि शिल्पी गौतम रेप और मर्डर केस में भी सम्राट चौधरी का नाम आरोपियों में शामिल था और उनकी भूमिका संदिग्ध रही है। उन्होंने सीबीआई जांच का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि क्या इस मामले में सम्राट का सैंपल लिया गया था। इन आरोपों ने सम्राट चौधरी के अतीत को फिर से राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। इस विषय पर जेडीयू विधान परिषद सदस्य नीरज कुमार ने सम्राट पर लगे आरोपों पर स्पष्टीकरण देने की बात करते हुए यह भी कहा कि बिना आग के धुंआ नहीं उठता है।
सम्राट चौधरी के नेतृत्व को भी चुनौतीः-
सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाए जाने को लेकर JDu के वरिष्ठ नेता एवं नीतीश कुमार के मानस पुत्र कहे जाने वाले अशोक चौधरी ने उनकी शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठाते हुए कहा – बिहार को 7वीं पास और इंजीनियरिंग ग्रेजुएट नेतृत्व के चयन का मौका मिले तो वो जरूर निशांत जो इंजीनियरिंग ग्रेजुएट हैं , और नीतीश कुमार के पुत्र हैं , उन्हें चुनेंगे।
भाजपा की रणनीति पर सवालः-
सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना भाजपा के लिए एक बड़ा राजनीतिक निर्णय है। पार्टी, जो अब तक परिवारवादी सोच से दूर संगठनात्मक पृष्ठभूमि और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक प्रतिबद्धता को प्राथमिकता देती रही है, उसने इस बार एक ऐसे नेता को आगे बढ़ाया है, जिनकी छवि विवादों और आरोपों से घिरी रही है। वे न तो पारंपरिक आरएसएस पृष्ठभूमि से आते हैं और न ही ‘क्लासिक कैडर लीडर’ माने जाते हैं। और तो और जो परिवारवाद और दलबदल की राजनीति में आकंठ डूबा हुआ है। इसके बावजूद उन्हें शीर्ष पद पर लाना यह संकेत देता है कि पार्टी अब वैचारिक कसौटी से अधिक राजनीतिक समीकरणों को प्राथमिकता दे रही है। परन्तु राजनीतिक समीकरण भी कुछ और हीं बयां करती है।
4.2% बनाम बहुसंख्यक: जातीय गणित पर सवालः-
करीब 14 करोड़ आबादी वाले बिहार की, जाति आधारित गणना के अनुसार, राज्य में कुशवाहा/कोयरी समाज की संख्या बल करीब 55.06 लाख है, जो कुल आबादी का लगभग 4.21% है। इसी समाज से आने वाले सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाए जाने से यह सवाल उठ रहा है कि आखिर BJP ने यह निर्णय किस सामाजिक आधार पर लिया?
यदि आबादी के हिसाब से देखें, तो बिहार की सबसे बड़ी जाति यादव (14.26%) है। इसके बाद दुसाध (5.31%), रविदास/राम (5.2%), कोयरी (4.2%) और ब्राह्मण (3.65%) प्रमुख हैं।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या भाजपा ने सामाजिक प्रतिनिधित्व के व्यापक आधार को नजरअंदाज करते हुए एक सीमित जनाधार वाले नेता को प्राथमिकता दी है?
निष्कर्ष
सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि कई स्तरों पर बदलाव का संकेत है। चाहे वह जातीय राजनीति हो, या चारित्रिक। BJP की नई रणनीति हो या फिर नेतृत्व चयन के नए मानदंड ?
लेकिन 4.2% आबादी वाले समाज से मुख्यमंत्री बनाना, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पृष्ठभूमि का अभाव, वंशवाद और लगातार उठते बलात्कार – हत्या, नरसंहार जैसे गंभीर आरोप – ये सभी कारक इस फैसले को बहस और विवाद के केंद्र में ला रहे हैं।
अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या यह “राजनीतिक प्रयोग” बिहार में स्थिरता और विकास लाता है, या फिर यह निर्णय भाजपा के लिए भविष्य में नई चुनौतियां खड़ा करता है।
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