कर्ज, ‘शीशमहल’ और बिहार में NDA का तीसरा शपथ का पॉवर शो

पटना :- बिहार में आज 7 मई को होने जा रहा NDA का तीसरा शपथग्रहण अब सिर्फ एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रदर्शन, या यूं कह लें कि – NDA का पॉवर शो है। मंत्रिमंडल विस्तार का यह शपथ आर्थिक दबाव और सरकार की प्राथमिकताओं पर उठते सवालों का केंद्र बन गया है। ऐसा इसलिए कि आमतौर पर शपथग्रहण मुख्यमंत्री के बदलाव या गठबंधन में फेरबदल पर हीं होता है। लेकिन ऐसा तो कुछ भी नहीं हुआ है। सम्राट चौधरी के नेतृत्व में पटना के गांधी मैदान में होने वाला यह आयोजन जहां 27 मंत्रियों के शपथ के साथ शक्ति संतुलन दिखाएगा, वहीं इसके समानांतर कई विवाद भी उभर रहे हैं।

भारी जनादेश, लेकिन बार-बार शपथ क्यों?

18वीं विधानसभा चुनाव का नतीजा 14 नवंबर 2025 को हीं सामने आ गया। बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चेहरे पर NDA ने बिहार विधान सभा चुनाव लड़ा, और 243 में से 202 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया। इस जीत के बाद नीतीश कुमार ने 20 नवम्बर 2025 को 18वीं बिहार विधान सभा के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ भी लिया।

इसके करीब 5 महीने बीतने के बाद, नेतृत्व में बदलाव कर BJP की ओर से सम्राट चौधरी को CM के तौर पर 15 अप्रैल 2026 को शपथ दिलाई गई। फिर भी, एक ही कार्यकाल में बार-बार शपथग्रहण ने यह बहस छेड़ दी है कि यह केवल कैबिनेट विस्तार है या फिर राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का सुनियोजित मंच, जिसे जनता की गाढ़ी कमाई के पैसों से आयोजित किया जा रहा है।

चुनावी ‘सौगात’ से कर्ज तक

चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत करीब 1.56 करोड़ महिलाओं को ₹10,000 की राशि दी गई। विपक्ष ने इसे “वोट प्रभावित करने” का प्रयास बताया। अब वही सरकार वित्तीय संकट से निपटने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक से ₹12,000 करोड़ तो वहीं विश्व बैंक से ₹4,750 करोड़ का कर्ज लेने की प्रक्रिया में है। यह घटनाक्रम यह सवाल खड़ा करता है कि क्या चुनावी फैसलों ने वित्तीय संतुलन को प्रभावित किया?

पेंशन अटकी, कर्ज बढ़ा

करीब 1 करोड़ लोगों की 2 महीने की सामाजिक सुरक्षा पेंशन लंबित है। स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड जैसी योजनाओं में देरी हो रही है। तो वहीं बिहार सरकार पर कुल कर्ज ₹3.70 लाख करोड़ से अधिक हो गया है। स्पष्ट है कि सरकार को बुनियादी सामाजिक दायित्व निभाने के लिए भी उधार का सहारा लेना पड़ रहा है।

‘शीशमहल’ विवाद: प्राथमिकताओं पर नया सवाल

इसी बीच सम्राट चौधरी के लिए 10 एकड़ में प्रस्तावित भव्य आवास (जिसे विपक्ष ‘शीशमहल’ कह रहा है) ने विवाद को और गहरा कर दिया है। आलोचकों का तर्क है: –
* जब राज्य कर्ज और पेंशन संकट से जूझ रहा है।
* तब इतने बड़े और महंगे आवासीय प्रोजेक्ट का क्या औचित्य है?
यह मुद्दा सरकार की “प्राथमिकताओं” बनाम “जनहित” की बहस को और तेज कर रहा है।

भव्य शपथग्रहण बनाम आर्थिक संवेदनशीलता

नरेंद्र मोदी, अमित शाह और अन्य बड़े नेताओं की मौजूदगी इस कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्तर का शक्ति प्रदर्शन बना रही है। लेकिन आलोचना यह है कि:-
यह आयोजन “जनता के पैसे से जश्न” जैसा दिखता है। आर्थिक संकट के समय सादगी की अपेक्षा की जा रही थी, परंतु सरकार करोड़ों का फिजूल खर्च कर अपना शक्ति प्रदर्शन कर रही है।

राजनीति बनाम जिम्मेदारी

बिहार की मौजूदा स्थिति एक गहरे विरोधाभास को सामने लाती है। एक तरफ प्रचंड जनादेश और मजबूत सरकार और दूसरी तरफ कर्ज, लंबित योजनाएं और विवादित खर्च। तीसरा शपथग्रहण, चुनावी सौगातें, बढ़ता कर्ज और ‘शीशमहल’ जैसे मुद्दे मिलकर यह सवाल खड़ा करते हैं कि – क्या सरकार राजनीतिक प्रदर्शन में ज्यादा निवेश कर रही है, या आर्थिक स्थिरता और जनकल्याण उसकी प्राथमिकता है? आने वाले समय में यही सवाल बिहार की राजनीति की दिशा तय करेंगे।

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