लखनऊ: बिहार के जमुई से सामने आया एक वीडियो इन दिनों लोगों को भीतर तक झकझोर रहा है। वीडियो में एक नाबालिग लड़की और उसके साथ मौजूद नाबालिग लड़के को कुछ लोगों द्वारा रोककर कथित तौर पर बदसलूकी और मारपीट करते हुए देखा गया। लड़की मदद की गुहार लगाती नजर आती है। घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस ने मामले का संज्ञान लिया और कार्रवाई शुरू की। पुलिस के अनुसार, घटना 19 सितंबर की शाम की है। मामले में FIR दर्ज कर SIT गठित की गई है और तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि अन्य आरोपियों की तलाश जारी है।
लेकिन इस पूरी घटना को केवल कुछ लोगों की कथित करतूत और उनकी गिरफ्तारी तक सीमित कर देना शायद हमारे लिए सबसे आसान रास्ता होगा। असली सवाल इससे कहीं बड़ा है।
आखिर हम किस तरह के समाज का निर्माण कर रहे हैं?
किसी भी संवेदनशील इंसान के लिए ऐसे दृश्य विचलित करने वाले हो सकते हैं। लेकिन इस घटना को देखने के बाद हमारा गुस्सा केवल आरोपियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हमें अपने समाज के उस हिस्से पर भी विचार करना चाहिए, जहां किसी लड़की की असहायता कुछ लोगों के लिए तमाशा बन जाती है और किसी की निजता तथा गरिमा को कुचलना उन्हें अपराध जैसा महसूस नहीं होता।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऐसे लोग किसी दूसरे ग्रह से नहीं आते। वे इसी समाज का हिस्सा होते हैं। वे हमारे आसपास रहते हैं, परिवारों में पले-बढ़े होते हैं और उसी सामाजिक वातावरण से आते हैं जिसमें हम और आप रहते हैं। इसलिए यह सवाल केवल पुलिस, प्रशासन या सरकार से नहीं है।
यह सवाल हमसे भी है।
हम अपने बच्चों को क्या सिखा रहे हैं? हम उन्हें दूसरे व्यक्ति की गरिमा और उसकी सहमति का कितना महत्व समझा रहे हैं?क्या हम लड़कों को यह सिखा रहे हैं कि किसी लड़की की आजादी, उसका शरीर और उसकी पसंद उसके अपने अधिकार हैं? क्या हम लड़कियों को यह भरोसा दे पा रहे हैं कि गलत होने पर वे बिना डर अपनी बात कह सकती हैं?
इन सवालों से बचकर कोई सुरक्षित समाज नहीं बनाया जा सकता।
सुरक्षा का दावा और जमीन की हकीकत
सरकारें और प्रशासन अक्सर कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा को लेकर अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि नागरिकों की सुरक्षा राज्य की मूल जिम्मेदारियों में शामिल है।
लेकिन किसी भी सरकार के लिए असली कसौटी केवल यह नहीं हो सकती कि अपराध के बाद कितनी गिरफ्तारियां हुईं। असली कसौटी यह भी है कि लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर कितना सुरक्षित महसूस होता है और शिकायत सामने आने पर व्यवस्था कितनी संवेदनशीलता और तेजी से काम करती है।
जमुई मामले में पुलिस ने वीडियो सामने आने के बाद कार्रवाई की, पीड़ितों की पहचान कर उनके बयान दर्ज किए और SIT का गठन किया। पुलिस ने वायरल वीडियो को आगे साझा न करने की अपील भी की है।
यह कार्रवाई जरूरी है, लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि पीड़ित बच्चों की पहचान और निजता सुरक्षित रहे, उनकी काउंसलिंग तथा सुरक्षा का ध्यान रखा जाए और जांच निष्पक्ष तरीके से आगे बढ़े।
क्योंकि न्याय सिर्फ आरोपी को गिरफ्तार करने का नाम नहीं है। न्याय का मतलब पीड़ित को सुरक्षा, सम्मान और भरोसा देना भी है।
वायरल वीडियो भी बन रहा है एक सवाल
इस घटना का वीडियो सामने आने के बाद लोगों में आक्रोश स्वाभाविक है। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि किसी नाबालिग पीड़ित के साथ हुई घटना के वीडियो को बार-बार शेयर करना समस्या का समाधान नहीं है। ऐसे वीडियो पीड़ित की निजता को और नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए समाज के रूप में हमारी जिम्मेदारी केवल आरोपियों की पहचान और सजा की मांग करना नहीं, बल्कि पीड़ितों की गरिमा की रक्षा करना भी है।
वीडियो शेयर करना बहादुरी नहीं है। अपराध की सूचना देना और पीड़ित की मदद करना जिम्मेदारी है।
बात सिर्फ जमुई की नहीं है
जमुई की घटना के बाद एक और घटना का जिक्र करना इसलिए जरूरी है क्योंकि अलग-अलग जगहों से बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर शिकायतें सामने आती रहती हैं। हाल ही में नवादा के एक स्कूल में छात्राओं द्वारा प्रधानाध्यापक पर लगाए गए गंभीर आरोपों के बाद गिरफ्तारी हुई। ऐसे मामलों में आरोपों की न्यायिक पुष्टि अपनी प्रक्रिया के अनुसार होगी, लेकिन शिकायत सामने आने का अर्थ यह जरूर है कि संस्थानों के भीतर बच्चों की सुरक्षा को लेकर सतर्कता लगातार जरूरी है।
स्कूल हो, सड़क हो, बाजार हो या कोई सुनसान इलाका—सुरक्षा को केवल पुलिस की मौजूदगी से नहीं मापा जा सकता।
सुरक्षा एक सामाजिक संस्कार भी है।
जब कोई लड़की रास्ते से गुजर रही हो तो उसे घूरना, उसका पीछा करना, उसका वीडियो बनाना या उसकी इच्छा के खिलाफ उसे छूना सामान्य व्यवहार नहीं है। यह समझ केवल कानून के डर से नहीं, बल्कि सम्मान और संवेदनशीलता से पैदा होनी चाहिए।
हमें कैसा समाज चाहिए?
हम ऐसा समाज चाहते हैं जहां लड़की को घर से निकलने से पहले यह न सोचना पड़े कि रास्ते में उसके साथ क्या होगा। हम ऐसा समाज चाहते हैं जहां किसी बच्चे को गलत व्यवहार का सामना करने पर चुप रहने की सलाह न दी जाए। हम ऐसा समाज चाहते हैं जहां किसी पीड़ित से उसके कपड़े, उसके बाहर जाने या उसके साथ मौजूद व्यक्ति के बारे में सवाल करने से पहले अपराध करने वाले से सवाल किया जाए, और सबसे महत्वपूर्ण हम ऐसा समाज चाहते हैं जहां कानून अपने हाथ में लेने वालों को यह भ्रम न हो कि भीड़ बनकर वे किसी की गरिमा छीन सकते हैं।
जमुई की घटना हमें गुस्सा दिलाती है। लेकिन इस गुस्से को केवल सोशल मीडिया की पोस्ट और कुछ दिनों की बहस तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसे बच्चों की बेहतर परवरिश, स्कूलों में जागरूकता, परिवारों में संवाद, सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा और कानून के प्रभावी पालन में बदलना होगा।
सरकार अपनी जिम्मेदारी निभाए, पुलिस निष्पक्ष जांच करे, अदालत कानून के मुताबिक फैसला दे और समाज अपनी जिम्मेदारी समझे—इन सभी के बिना सुरक्षित वातावरण बनाना मुश्किल है।
क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान सिर्फ उसकी सड़कों, इमारतों या विकास के आंकड़ों से नहीं होती। उसकी असली पहचान इस बात से होती है कि वहां सबसे कमजोर और सबसे असहाय व्यक्ति कितना सुरक्षित महसूस करता है।
जमुई की घटना इसलिए सिर्फ एक खबर नहीं होनी चाहिए। यह हमारे लिए एक आईना होनी चाहिए।
और उस आईने में अगर हमें कुछ गलत दिखाई देता है, तो केवल दूसरों को दोष देने के बजाय खुद से भी सवाल करना होगा।
हम सुधरेंगे, तभी समाज सुधरेगा।
और समाज सुधरेगा, तभी आने वाली पीढ़ियां सचमुच सुरक्षित होंगी।


