नई दिल्लीः- देश में जनगणना को लेकर लंबे समय से चल रही इंतज़ार की घड़ी अब खत्म होने जा रही है। जनगणना (Census) 2027 की शुरुआत 1 अप्रैल से होगी। यह स्वतंत्र भारत की आठवीं और अब तक की 16वीं जनगणना होगी। खास बात यह है कि इस बार पूरी प्रक्रिया डिजिटल माध्यम से कराई जाएगी, जिससे डेटा जुटाने और उसे समझने का तरीका पहले से कहीं अधिक आधुनिक और तेज़ होगा।
नई दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में महारजिस्ट्रार और जनगणना आयुक्त मृत्युंजय कुमार नारायण ने बताया कि जनगणना को इस बार दो चरणों में पूरा किया जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे जानकारी अधिक सटीक और व्यवस्थित तरीके से इकट्ठा की जा सकेगी।
पहले चरण में घर-घर जानकारी, साथ में खुद भरने का विकल्प
मिली जानकारी के अनुसार, जनगणना के पहले चरण में ‘हाउस लिस्टिंग’ होगी, यानी सरकारी कर्मचारी घर-घर जाकर यह जानकारी जुटाएंगे कि किस घर में कितने लोग रहते हैं और वहां कौन-कौन सी बुनियादी सुविधाएं मौजूद हैं।
इस बार एक बड़ा बदलाव यह है कि लोगों को स्व-गणना (Self Enumeration) का विकल्प भी मिलेगा। यानी आप खुद अपने मोबाइल या कंप्यूटर के जरिए अपनी जानकारी ऑनलाइन भर सकेंगे। यह सुविधा घर-घर सर्वे शुरू होने से करीब 15 दिन पहले दी जाएगी। यह चरण 1 अप्रैल से 30 सितंबर के बीच तय 30 दिनों में पूरा किया जाएगा।
दूसरे चरण में विस्तृत जानकारी और जाति गणना
दूसरे चरण में लोगों से उनकी शिक्षा, रोजगार, सामाजिक स्थिति जैसी विस्तृत जानकारी ली जाएगी। इसी चरण में जाति आधारित आंकड़े भी जुटाए जाएंगे। लंबे समय से इसकी मांग की जा रही थी, ऐसे में इसे शामिल किया जाना काफी अहम माना जा रहा है।
16 भाषाओं में पोर्टल, पूरी प्रक्रिया होगी डिजिटल
सरकार ने इस बार जनगणना को पूरी तरह डिजिटल बनाने पर जोर दिया है। गणनाकर्मी मोबाइल ऐप के जरिए डेटा दर्ज करेंगे, जिससे जानकारी सीधे सिस्टम में सेव होगी और गलती की संभावना कम होगी।
स्व-गणना के लिए तैयार पोर्टल 16 भाषाओं में उपलब्ध होगा, ताकि देश के अलग-अलग हिस्सों के लोग आसानी से इसमें भाग ले सकें। इसके अलावा, पूरी प्रक्रिया की निगरानी के लिए वेब-आधारित सिस्टम तैयार किया गया है। हाउस लिस्टिंग ब्लॉक (HLB) बनाने के लिए वेब मैपिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे कोई भी इलाका छूटने न पाए।
जनगणना का इतिहास: कब हुई थी पहली जनगणना?
जैसा कि हम सभी जानते है कि भारत में जनगणना की परंपरा काफी पुरानी है। पहली बार 1872 में ब्रिटिश शासन के दौरान जनगणना की गई थी, लेकिन इसे पूरी तरह व्यवस्थित रूप में 1881 से शुरू किया गया। इसके बाद हर 10 साल में जनगणना कराना तय हुआ।
आजादी के बाद पहली जनगणना 1951 में हुई। इसके बाद 1961, 1971, 1981, 1991, 2001 और 2011 में यह प्रक्रिया नियमित रूप से जारी रही। 2021 में जनगणना प्रस्तावित थी, लेकिन कोरोना महामारी के कारण इसे टाल दिया गया।
आखिरी बार कब हुई थी जाति गणना?
भारत में आखिरी बार पूरी तरह से जाति आधारित जनगणना (caste based census)1931 में हुई थी। आजादी के बाद से केवल अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आंकड़े ही जुटाए जाते रहे हैं।
हालांकि, 2011 में सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) कराई गई थी, लेकिन उसके आंकड़े पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किए गए। ऐसे में 2027 की जनगणना में जाति आधारित डेटा शामिल होना एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
क्यों अहम है यह जनगणना?
गौरतलब है कि, जनगणना सिर्फ आबादी गिनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह सरकार की योजनाओं और नीतियों की नींव होती है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि किस इलाके में कितनी आबादी है, लोगों की आर्थिक स्थिति क्या है और उन्हें किन सुविधाओं की जरूरत है।
ऐसे में डिजिटल माध्यम से होने वाली यह जनगणना भविष्य के भारत की तस्वीर तय करने में अहम भूमिका निभाएगी। ऐसे में हर नागरिक की भागीदारी जरूरी मानी जा रही है, ताकि देश के विकास की सही दिशा तय की जा सके।
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