UPSC के 100 साल: सिफारिशों से योग्यता तक, औपनिवेशिक व्यवस्था से संवैधानिक स्वतंत्रता तक का ऐतिहासिक सफर
नई दिल्ली: भारत में सरकारी नौकरियों में योग्यता, निष्पक्षता और समान अवसर की चर्चा जब भी होती है, संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) का नाम प्रमुखता से सामने आता है। देश की प्रशासनिक व्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला यह संस्थान 1 अक्टूबर 2026 को अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर रहा है। एक सदी पहले जिस आयोग की स्थापना सीमित अधिकारों वाले सलाहकार निकाय के रूप में हुई थी, वह आज भारतीय संविधान के तहत कार्य करने वाली स्वतंत्र संस्था बन चुका है। इस दौरान न केवल आयोग की संरचना और जिम्मेदारियां बदलीं, बल्कि सरकारी सेवाओं में भर्ती का स्वरूप, परीक्षा प्रणाली और उम्मीदवारों की भागीदारी भी व्यापक रूप से परिवर्तित हुई है।
UPSC के सौ वर्षों का यह सफर महज एक संस्थान की स्थापना और विस्तार की कहानी नहीं है। यह उस प्रशासनिक व्यवस्था के विकास का इतिहास भी है, जिसमें कभी भारतीयों के लिए उच्च सरकारी सेवाओं में प्रवेश करना लगभग असंभव था। आज उसी व्यवस्था में देश के अलग-अलग राज्यों, भाषाओं, सामाजिक वर्गों और आर्थिक पृष्ठभूमियों से आने वाले लाखों युवा अपनी योग्यता के आधार पर जगह बनाने की कोशिश करते हैं। हालांकि, इस बदलाव के साथ समान अवसर, परीक्षा की पारदर्शिता और चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़े सवाल भी लगातार प्रासंगिक बने हुए हैं।
सिफारिशों से योग्यता आधारित चयन तक की शुरुआत
भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में योग्यता के आधार पर भर्ती की औपचारिक अवधारणा वर्ष 1855 में सामने आई, जब लंदन में इंडियन सिविल सर्विस (ICS) की प्रतियोगी परीक्षा शुरू की गई। इस व्यवस्था ने ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर में प्रचलित नामांकन और सिफारिश आधारित नियुक्तियों की जगह खुली प्रतियोगिता को अपनाया। हालांकि, यह बदलाव सिद्धांत के स्तर पर जितना महत्वपूर्ण था, व्यवहार में उतना ही सीमित भी था।
उस समय परीक्षा केवल लंदन में आयोजित की जाती थी और अंग्रेजी भाषा के साथ ग्रीक तथा लैटिन जैसे विषयों का ज्ञान भी आवश्यक था। इन विषयों का किसी भारतीय जिले के प्रशासन से सीधा संबंध नहीं था, लेकिन ब्रिटिश शिक्षा व्यवस्था में प्रशिक्षित उम्मीदवारों को इससे लाभ मिलता था। भारत से लंदन जाकर परीक्षा देना भी अधिकांश युवाओं के लिए आर्थिक और सामाजिक रूप से कठिन था। इसके अतिरिक्त, परीक्षा की अधिकतम आयु सीमा को धीरे-धीरे 23 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष कर दिया गया, जिससे भारतीय उम्मीदवारों के लिए तैयारी का अवसर और सीमित हो गया।
इन परिस्थितियों के बावजूद कुछ भारतीयों ने इस व्यवस्था की बाधाओं को पार किया। वर्ष 1862 में रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर, जो उस समय 21 वर्ष के थे, परीक्षा में शामिल होने के लिए इंग्लैंड गए। उन्होंने 1863 में परीक्षा पास की और 1864 में सेवा में शामिल हुए। वह इंडियन सिविल सर्विस में प्रवेश पाने वाले पहले भारतीय बने। अंग्रेज इस सेवा को ‘हेवन-बॉर्न सर्विस’ यानी स्वर्ग से आई सेवा कहते थे। सत्येंद्रनाथ टैगोर ने बॉम्बे प्रेसिडेंसी में तीन दशक से अधिक समय तक सेवाएं दीं।
उनके बाद सुरेंद्रनाथ बनर्जी, बिहारी लाल गुप्ता और रमेश चंद्र दत्त जैसे भारतीयों ने भी इस परीक्षा में सफलता प्राप्त की। हालांकि, उनकी सफलता के बावजूद भारतीयों की संख्या सीमित बनी रही। वर्ष 1919 तक कुल 1,255 ICS अधिकारियों में केवल 78 भारतीय थे। यह आंकड़ा उस समय की प्रशासनिक व्यवस्था में भारतीयों की सीमित भागीदारी को स्पष्ट करता है।
इसी दौरान भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में प्रशासनिक सेवाओं में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने की मांग तेज हुई। मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के बाद बने भारत सरकार अधिनियम, 1919 में लोक सेवा आयोग की स्थापना का प्रावधान किया गया। वर्ष 1922 में पहली बार लंदन के साथ भारत में भी इलाहाबाद में ICS की परीक्षा आयोजित की गई। बाद में 1928 में भारतीय परीक्षा केंद्र को दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया।
वर्ष 1924 में आर्थर हैमिल्टन ली की अध्यक्षता में गठित ली आयोग ने तत्काल एक वैधानिक लोक सेवा आयोग स्थापित करने की सिफारिश की। आयोग ने भर्ती के लिए एक ऐसी व्यवस्था का प्रस्ताव रखा, जिसमें प्रत्येक दस नियुक्तियों में चार ब्रिटिश, चार भारतीय और दो भारतीय प्रांतीय सेवाओं से पदोन्नत अधिकारी शामिल हों। इस व्यवस्था को प्रतिनिधित्व बढ़ाने की दिशा में एक कदम माना गया, लेकिन इसमें ब्रिटिश अधिकारियों के लिए 40 प्रतिशत पद निर्धारित होने के कारण समान प्रतियोगिता की अवधारणा सीमित ही रही।
आखिरकार, 1 अक्टूबर 1926 को लोक सेवा आयोग की स्थापना हुई। इसका गठन भारत सरकार अधिनियम, 1919 की धारा 96B और 96C के तहत बनाए गए लोक सेवा आयोग (कार्य) नियम, 1926 के अंतर्गत किया गया था। यूनाइटेड किंगडम की होम सिविल सर्विस के सदस्य सर रॉस बार्कर इसके पहले अध्यक्ष बने। उनके साथ चार सदस्य भी नियुक्त किए गए। आयोग का पहला कार्यालय दिल्ली के मेटकाफ हाउस में स्थापित किया गया।
हालांकि, उस समय आयोग के अधिकार सीमित थे और स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने इसकी आलोचना भी की। इसके बावजूद भारत में भर्ती से संबंधित कार्यों के लिए एक स्थायी संस्था का स्थापित होना प्रशासनिक इतिहास में महत्वपूर्ण बदलाव था। यही कारण है कि UPSC अपनी संस्थागत यात्रा की शुरुआत 1 अक्टूबर 1926 से मानता है।
आजादी से पहले आयोग की बदलती भूमिका
वर्ष 1926 में स्थापना के बाद आयोग की संरचना और अधिकारों में कई बदलाव हुए। भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके तहत नियुक्तियों से संबंधित शक्तियां गवर्नर-जनरल को सौंपी गईं और संघीय तथा प्रांतीय लोक सेवा आयोगों की व्यवस्था की गई। भर्ती, नियुक्ति, पदोन्नति, अनुशासनात्मक मामलों और सेवा नियमों से जुड़े विषयों में आयोग से परामर्श करना अनिवार्य बनाया गया।
1 अप्रैल 1937 को इसका नाम बदलकर संघीय लोक सेवा आयोग कर दिया गया। इसके अगले वर्ष यानी 1938 में कई सेवाओं के लिए संयुक्त प्रतियोगी परीक्षाएं शुरू हुईं। इससे एकीकृत और बहु-सेवा भर्ती की दिशा में कदम बढ़ा। वर्ष 1940 में पहली बार इंडियन सिविल सर्विस में भारतीयों की संख्या यूरोपीय अधिकारियों से अधिक हो गई। उस समय सेवा में 625 भारतीय और 575 यूरोपीय अधिकारी थे।
वर्ष 1947 आयोग के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। H.K कृपलानी इसके पहले भारतीय अध्यक्ष बने। स्वतंत्रता के बाद दिसंबर में पहली परीक्षा आयोजित की गई और औपनिवेशिक शासन की ICS व्यवस्था की जगह भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी IAS ने ले ली। वर्ष 1948 में संयुक्त परीक्षा के माध्यम से भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों का पहला बैच भी भर्ती किया गया।
इस प्रकार स्वतंत्रता से पहले स्थापित आयोग धीरे-धीरे उस प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बन रहा था, जिसे आजाद भारत में लोकतांत्रिक और संवैधानिक आधार पर संचालित किया जाना था।
संविधान ने दी स्वतंत्रता और संस्थागत मजबूती
स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था का निर्माण करना था, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप हो और राजनीतिक सत्ता में बदलाव के बावजूद निष्पक्षता के साथ काम कर सके। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए संविधान निर्माताओं ने लोक सेवा आयोग को संवैधानिक संरक्षण देने का निर्णय लिया।
22 अगस्त 1949 को संविधान सभा में प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों से संबंधित प्रावधान प्रस्तुत किए। ये प्रावधान बाद में संविधान के भाग XIV में अनुच्छेद 315 से 323 के रूप में शामिल हुए। संविधान लागू होने के साथ 26 जनवरी 1950 को संघीय लोक सेवा आयोग का नाम बदलकर संघ लोक सेवा आयोग कर दिया गया। आर.एन. बनर्जी इसके अध्यक्ष बने।
लोक सेवा आयोग की स्वतंत्रता को लेकर संविधान सभा में विशेष महत्व दिया गया। 26 नवंबर 1949 को अपने विदाई भाषण में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सरकारी नियुक्तियों में निष्पक्षता बनाए रखने तथा भाई-भतीजावाद, पक्षपात और अनियमितताओं को रोकने के लिए लोक सेवा आयोगों की स्वतंत्रता को आवश्यक बताया था।
आपको बता दे कि, संविधान के अनुच्छेद 315 में संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोगों की स्थापना का प्रावधान किया गया है। इसमें दो या दो से अधिक राज्यों के लिए संयुक्त लोक सेवा आयोग बनाने की व्यवस्था भी शामिल है। अनुच्छेद 316 के अनुसार आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। अनुच्छेद 317 के तहत किसी सदस्य को हटाने या निलंबित करने की प्रक्रिया निर्धारित है, जिसमें संबंधित परिस्थितियों में सर्वोच्च न्यायालय की जांच का प्रावधान शामिल है।
अनुच्छेद 318 आयोग के सदस्यों और कर्मचारियों की सेवा शर्तों के संबंध में नियम बनाने की शक्ति प्रदान करता है। अनुच्छेद 319 कार्यकाल समाप्त होने के बाद आयोग के सदस्यों के अन्य पदों पर नियुक्ति से संबंधित प्रतिबंध निर्धारित करता है। इसके तहत UPSC के अध्यक्ष को केंद्र या किसी राज्य सरकार के अधीन आगे किसी अन्य पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 320 आयोग के प्रमुख कार्यों को परिभाषित करता है। इसके अंतर्गत संघ की सेवाओं में नियुक्ति के लिए परीक्षाएं आयोजित करना तथा भर्ती के तरीकों, पदोन्नति और अनुशासनात्मक मामलों में सरकार को सलाह देना शामिल है। अनुच्छेद 321 संसद और राज्य विधानमंडलों को आयोग के कार्यक्षेत्र का विस्तार करने की शक्ति देता है। वहीं अनुच्छेद 322 के तहत आयोग का खर्च भारत की संचित निधि पर भारित किया गया है, जिससे उसकी वित्तीय स्वतंत्रता सुनिश्चित होती है।
अनुच्छेद 323 आयोग को अपनी वार्षिक रिपोर्ट राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करने का दायित्व देता है। यदि सरकार किसी मामले में आयोग की सलाह स्वीकार नहीं करती है, तो संबंधित मामलों और उनके कारणों को संसद के समक्ष रखा जाता है।
इन संवैधानिक प्रावधानों का महत्व केवल आयोग की प्रशासनिक संरचना तक सीमित नहीं है। इनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी नियुक्तियों की प्रक्रिया किसी एक सरकार या राजनीतिक नेतृत्व की मनमर्जी पर निर्भर न रहे और उसमें संस्थागत निष्पक्षता बनी रहे।
परीक्षा आयोजित करने से लेकर प्रशासन को सलाह देने तक जिम्मेदारियां
UPSC को आमतौर पर सिविल सेवा परीक्षा के लिए जाना जाता है, लेकिन इसकी जिम्मेदारियां इससे कहीं अधिक व्यापक हैं। आयोग सिविल सेवा परीक्षा के अलावा भारतीय वन सेवा, इंजीनियरिंग सेवा, संयुक्त चिकित्सा सेवा, राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और नौसेना अकादमी, संयुक्त रक्षा सेवा तथा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में सहायक कमांडेंट के पदों के लिए भी परीक्षाएं आयोजित करता है।
इसके अतिरिक्त मंत्रालयों और विभिन्न सरकारी विभागों की मांग के आधार पर विशेष पदों के लिए सीधी भर्ती की प्रक्रिया भी आयोग के माध्यम से पूरी की जाती है। इनमें साक्षात्कार और भर्ती परीक्षा के जरिए उम्मीदवारों का चयन किया जाता है।
आयोग की एक अन्य महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सरकार को भर्ती नियमों और पदोन्नति संबंधी मामलों में सलाह देना है। विभागीय पदोन्नति समितियों के माध्यम से अधिकारियों की पदोन्नति, अखिल भारतीय सेवाओं में शामिल किए जाने और अनुशासनात्मक मामलों में भी आयोग की भूमिका रहती है।
वर्ष 2023-24 में आयोग ने पदोन्नति से संबंधित 24,581 अधिकारियों के रिकॉर्ड पर कार्रवाई की और 532 अधिकारियों को अखिल भारतीय सेवाओं में शामिल करने की प्रक्रिया में योगदान दिया। यह आंकड़ा बताता है कि आयोग की जिम्मेदारी केवल नई नियुक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी सेवाओं में अधिकारियों के करियर से जुड़े कई महत्वपूर्ण निर्णयों में भी उसकी भूमिका है।
पुलिस प्रशासन में भी आयोग की एक विशेष भूमिका है। सर्वोच्च न्यायालय के 22 सितंबर 2006 के प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में दिए गए आदेश के अनुसार, वर्ष 2012-13 से आयोग राज्यों में पुलिस महानिदेशक या पुलिस बल के प्रमुख की नियुक्ति के लिए वरिष्ठ IPS अधिकारियों का पैनल तैयार करने में भूमिका निभा रहा है। इससे पुलिस नेतृत्व की नियुक्तियों में निर्धारित प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है।
1926 से 2026 तक: बदलावों से भरा एक शताब्दी का सफर
UPSC के सौ वर्षों की यात्रा को केवल कुछ महत्वपूर्ण तारीखों से नहीं समझा जा सकता। इस दौरान आयोग ने औपनिवेशिक प्रशासन से लेकर स्वतंत्र भारत की संवैधानिक व्यवस्था तक कई चरणों में अपनी कार्यप्रणाली विकसित की। परीक्षा प्रणाली, भर्ती के तरीकों, तकनीक और उम्मीदवारों की भागीदारी में हुए बदलाव इस विकास को स्पष्ट करते हैं।
1926 से 1949: सीमित अधिकारों से संस्थागत विस्तार तक
वर्ष 1935 में भारत सरकार अधिनियम के तहत संघीय और प्रांतीय लोक सेवा आयोगों की व्यवस्था की गई। भर्ती, नियुक्ति, पदोन्नति, अनुशासनात्मक मामलों और सेवा नियमों से संबंधित विषयों में आयोग से परामर्श को महत्वपूर्ण स्थान मिला। 1937 में इसका नाम संघीय लोक सेवा आयोग रखा गया और 1938 में कई सेवाओं के लिए संयुक्त प्रतियोगी परीक्षाएं शुरू की गईं।
वर्ष 1940 में ICS में पहली बार भारतीयों की संख्या यूरोपीय अधिकारियों से अधिक हुई। वर्ष 1947 में H.K. कृपलानी आयोग के पहले भारतीय अध्यक्ष बने। उसी वर्ष आजादी के बाद दिसंबर में पहली परीक्षा आयोजित की गई और ICS के स्थान पर IAS ने प्रशासनिक व्यवस्था में जगह ली। 1948 में संयुक्त परीक्षा के माध्यम से भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों का पहला बैच भर्ती हुआ।
1950 से 1979: गणराज्य की सेवाओं का विकास
26 जनवरी 1950 को संघीय लोक सेवा आयोग संवैधानिक संस्था के रूप में संघ लोक सेवा आयोग बना और आर.एन. बनर्जी ने अध्यक्ष का पद संभाला। वर्ष 1950-51 में संविधान के तहत अखिल भारतीय सेवाओं के लिए पहली नियमित भर्ती हुई। इसमें IAS के लिए 29 और IPS के लिए 31 उम्मीदवारों की सिफारिश की गई। वर्ष 1951 में अखिल भारतीय सेवा अधिनियम लागू हुआ।
वर्ष 1966 में भारतीय वन सेवा को तीसरी अखिल भारतीय सेवा के रूप में स्थापित किया गया और 1967 में इसका पहला चयन हुआ। वर्ष 1969 में सिविल सेवा परीक्षा के निबंध और सामान्य अध्ययन के प्रश्नपत्रों में आठवीं अनुसूची की भाषाओं को विकल्प के रूप में शामिल किया गया।
वर्ष 1976 में आयोग ने अपनी स्वर्ण जयंती मनाई। इसी वर्ष पहली बार आवेदनों की संख्या एक लाख से अधिक हुई। डी.एस. कोठारी समिति ने परीक्षा को तीन चरणों में आयोजित करने का प्रस्ताव दिया। वर्ष 1977 में पहली संयुक्त चिकित्सा सेवा परीक्षा आयोजित हुई और 1978 में आयोग ने आवेदनों, उत्तर पुस्तिकाओं और अभिलेखों के प्रसंस्करण के लिए कंप्यूटर का इस्तेमाल शुरू किया।
वर्ष 1979 में सिविल सेवा परीक्षा की तीन चरणों वाली व्यवस्था लागू हुई। इसमें प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार शामिल थे। इसी दौरान मुख्य परीक्षा में आठवीं अनुसूची की भाषाओं को आधिकारिक तौर पर शामिल किया गया और लंदन में परीक्षा केंद्र बंद कर दिया गया।
1985 से 2010: आधुनिकीकरण और परीक्षा सुधार
वर्ष 1985 में आयोग की स्वीकृत सदस्य संख्या बढ़ाकर एक अध्यक्ष और दस सदस्य कर दी गई। 1988-89 में सतीश चंद्र समिति ने परीक्षा प्रणाली में कई सुधारों का सुझाव दिया। इनमें अतिरिक्त परीक्षा केंद्र, 200 अंकों का निबंध, प्रारंभिक परीक्षा में नकारात्मक अंकन और साक्षात्कार के अंकों में वृद्धि जैसी सिफारिशें शामिल थीं।
वर्ष 1989 में आयोग ने OMR तकनीक का इस्तेमाल शुरू किया। वर्ष 1992 में रोज मिलियन बाथेव खारबुली आयोग की पहली महिला अध्यक्ष बनीं। वर्ष 1993 में सिविल सेवा मुख्य परीक्षा में निबंध का प्रश्नपत्र शुरू किया गया और साक्षात्कार के अंक 250 से बढ़ाकर 300 कर दिए गए। वर्ष 1994 में मेडिकल साइंस को वैकल्पिक विषय के रूप में शामिल किया गया।
डिजिटल बदलाव की दिशा में वर्ष 2000 महत्वपूर्ण रहा। एसएएमपीईआरए (SAMPIRA) कॉमन एप्लीकेशन फॉर्म की शुरुआत के बाद ऑनलाइन रिक्रूटमेंट एप्लीकेशन यानी ORA व्यवस्था लागू की गई। वर्ष 2010 तक कई परीक्षाओं के लिए आवेदन की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन हो गई।
वर्ष 2003 में पहली केंद्रीय पुलिस बल सहायक कमांडेंट परीक्षा आयोजित हुई। 22 दिसंबर 2005 को आयोग के नए कार्यालय भवन, आयोग सचिवालय, का उद्घाटन किया गया। 12 नवंबर 2009 को राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने शासन और लोक सेवा विषय पर स्थापना दिवस व्याख्यान श्रृंखला का उद्घाटन किया। इसी वर्ष भारतीय कॉर्पोरेट विधि सेवा को सिविल सेवा परीक्षा में शामिल किया गया।
वर्ष 2010 में UPSC ने 20 से 22 नवंबर के बीच सार्क देशों के लोक सेवा आयोगों के प्रमुखों के सम्मेलन की मेजबानी की। इस आयोजन ने आयोग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अनुभव साझा करने का अवसर दिया।
2011 से 2026: डिजिटल, पारदर्शी और समावेशी व्यवस्था की ओर
वर्ष 2011 में सिविल सेवा अभिरुचि परीक्षा यानी सीसैट (C-SAT) की शुरुआत हुई। इसी वर्ष 1 सितंबर को सिंगल विंडो सिस्टम लागू किया गया। वर्ष 2013 में सिविल सेवा मुख्य परीक्षा का ढांचा बदला गया। सामान्य अध्ययन के चार प्रश्नपत्र शामिल किए गए, जिनमें नैतिकता, सत्यनिष्ठा और अभिरुचि जैसे विषयों को स्थान मिला। इसी वर्ष पहली बार कंप्यूटर आधारित भर्ती परीक्षाएं भी आयोजित की गईं। सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के माध्यम से भारतीय वन सेवा के उम्मीदवारों की स्क्रीनिंग की व्यवस्था भी शुरू हुई।
वर्ष 2015 में सीसैट (C-SAT) को 33 प्रतिशत अंकों के साथ क्वालिफाइंग पेपर बना दिया गया। वर्ष 2017 में इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा तीन चरणों वाली हुई और प्रश्नों पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए सात दिनों की ऑनलाइन सुविधा शुरू की गई। वर्ष 2018 में प्रश्न आधारित मार्क्स इन्फॉर्मेशन सिस्टम लागू किया गया। 2019 में परीक्षाओं की साल भर निगरानी के लिए विशेष नियंत्रण कक्ष बनाया गया।
वर्ष 2021 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) और नौसेना अकादमी (NA) परीक्षा में पहली बार महिलाओं को शामिल किया गया। एनडीए और एनए परीक्षा (II), 2021 का आयोजन 14 नवंबर को हुआ। वर्ष 2022 में सिविल सेवा परीक्षा के अंतर्गत आने वाली रेलवे की चार ग्रुप ए सेवाओं को मिलाकर भारतीय रेलवे प्रबंधन सेवा बनाई गई।
इन बदलावों के बाद 2025 और 2026 में आयोग ने पंजीकरण, परीक्षा सुरक्षा, साक्षात्कार और उम्मीदवारों की सुविधा से संबंधित कई नई पहलें शुरू कीं, जिनका उद्देश्य भर्ती प्रक्रिया को अधिक सुव्यवस्थित बनाना है।
आवेदन की संख्या में सौ गुना से अधिक वृद्धि
UPSC के कार्यक्षेत्र में विस्तार का सबसे स्पष्ट प्रमाण इसके आवेदन संबंधी आंकड़ों में दिखाई देता है। वर्ष 1950-51 में विभिन्न परीक्षाओं और चयन प्रक्रियाओं के लिए कुल 42,727 आवेदन प्राप्त हुए थे। वर्ष 2022-23 में यह संख्या बढ़कर 45,10,044 तक पहुंच गई। यानी सात दशकों से कुछ अधिक समय में आवेदनों की संख्या सौ गुने से भी ज्यादा हो गई।
उम्मीदवारों की भागीदारी के आंकड़े भी इस बदलाव की एक महत्वपूर्ण तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। वर्ष 1952 में सिविल सेवा परीक्षा में 83 अनुशंसित उम्मीदवारों में केवल तीन महिलाएं थीं। वर्ष 2025 में 958 अनुशंसित उम्मीदवारों में 299 महिलाएं शामिल थीं। इसी परीक्षा में महिलाओं ने शीर्ष 25 में से 11 स्थान हासिल किए।
अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों की भागीदारी में भी वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 1955 में सिविल सेवा परीक्षा में नौ एससी (SC) उम्मीदवारों की सिफारिश की गई थी, जबकि वर्ष 2025 में यह संख्या 158 रही। इसी तरह वर्ष 1956-57 में दो एसटी(ST) उम्मीदवारों की सिफारिश हुई थी, जबकि वर्ष 2025 में 73 एसटी उम्मीदवारों को अनुशंसित किया गया।
सभी परीक्षाओं में अनुसूचित जाति के आवेदकों की संख्या वर्ष 1956-57 के 1,713 से बढ़कर 2023-24 में 4,51,243 हो गई। इसी अवधि में अनुसूचित जनजाति के आवेदकों की संख्या 82 से बढ़कर 1,47,106 पहुंच गई।
बेंचमार्क विकलांगता वाले उम्मीदवारों की भागीदारी में भी बदलाव दिखाई देता है। वर्ष 2002 में सिविल सेवा परीक्षा में ऐसे तीन उम्मीदवार अनुशंसित हुए थे, जबकि 2025 में यह संख्या 42 रही। अनुशासनात्मक मामलों में आयोग की सलाह देने से जुड़ी जिम्मेदारी भी बढ़ी है। वर्ष 1950-51 में ऐसे 53 मामलों में सलाह दी गई थी, जबकि 2023-24 में यह संख्या 446 तक पहुंच गई।
ये आंकड़े आयोग के कार्यक्षेत्र और विभिन्न वर्गों की भागीदारी में आए बदलाव को सामने रखते हैं। हालांकि, अलग-अलग दशकों के आंकड़ों की तुलना करते समय परीक्षा की संरचना, आरक्षण व्यवस्था और पात्रता संबंधी नियमों में हुए बदलावों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और भारतीय भाषाओं को मिला स्थान
UPSC की सौ साल की यात्रा में महिलाओं की भागीदारी एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में सामने आई है। वर्ष 1949 से 1951 के बीच भारतीय विदेश सेवा के लिए केवल एक महिला और आईएएस के लिए दो महिलाओं का चयन हुआ था। वर्ष 1952 में सिविल सेवा परीक्षा में चयनित उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी महज 3.6 प्रतिशत थी। वर्ष 2025 में यह बढ़कर 31.2 प्रतिशत हो गई।
महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के साथ भारतीय भाषाओं में परीक्षा और साक्षात्कार की सुविधा का विस्तार भी उल्लेखनीय रहा है। वर्ष 1970-71 में आयोग ने सरकार को बताया था कि व्यक्तित्व परीक्षण केवल अंग्रेजी में आयोजित किया जा सकता है। हालांकि, वर्ष 1980-81 तक इस स्थिति में बदलाव हुआ और उम्मीदवारों को आयोग की ओर से उपलब्ध कराए गए दुभाषिये की सहायता से भारतीय भाषाओं में साक्षात्कार देने की सुविधा मिलने लगी।
वर्ष 2010-11 में 803 उम्मीदवारों ने भारतीय भाषा के माध्यम से साक्षात्कार दिया था। वर्ष 2023-24 में यह संख्या 307 रही। यह सुविधा उन उम्मीदवारों के लिए महत्वपूर्ण है, जो अपने विचारों को भारतीय भाषाओं में अधिक सहजता से व्यक्त कर सकते हैं।
मेटकाफ हाउस से धौलपुर भवन तक: आयोग के इतिहास से जुड़ी इमारतें
UPSC का इतिहास केवल परीक्षा और भर्ती से ही नहीं, बल्कि उन इमारतों और घटनाओं से भी जुड़ा है, जिन्होंने इसकी संस्थागत पहचान को आकार दिया।
दिल्ली का मेटकाफ हाउस, जिसे सर थॉमस मेटकाफ ने 1835 में बनवाया था, आयोग के इतिहास में विशेष स्थान रखता है। 1 अक्टूबर 1926 को स्थापित आयोग का कार्यालय इसी भवन में था। बाद में यह भवन स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक विरासत से जुड़ी एक ऐतिहासिक घटना का भी साक्षी बना।
21 अप्रैल 1947 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने मेटकाफ हाउस में सिविल सेवा के प्रशिक्षु अधिकारियों के पहले बैच को संबोधित किया था। इसी संबोधन में उन्होंने सिविल सेवा को भारत का स्टील फ्रेम कहा था। इस संबोधन की स्मृति में हर वर्ष 21 अप्रैल को सिविल सेवा दिवस मनाया जाता है।
आयोग के स्थायी मुख्यालय का इतिहास धौलपुर भवन से जुड़ा हुआ है। शाहजहां रोड पर स्थित इस भवन का निर्माण 1920 में धौलपुर के महाराजा राणा उदयभानु सिंह ने आर्ट डेको शैली में कराया था। दिल्ली आने-जाने के दौरान महाराजा इसके इस्तेमाल करते थे। 7 अप्रैल 1949 को धौलपुर रियासत के भारतीय संघ में विलय के बाद यह इमारत सरकारी संपत्ति बन गई। वर्ष 1952 में यह यूपीएससी का स्थायी मुख्यालय बना।
किरण बेदी से लेकर पहली महिला अध्यक्ष तक की कहानी
UPSC के इतिहास में महिलाओं की भागीदारी का एक महत्वपूर्ण अध्याय वर्ष 1972 में जुड़ा, जब किरण बेदी भारतीय पुलिस सेवा के लिए आयोग द्वारा चुनी जाने वाली पहली महिला बनीं। उस समय IPS में महिलाओं की कोई अधिकारी नहीं थी। वर्ष 1972 में इस सेवा के लिए कुल 80 पद थे और किरण बेदी उनमें चयनित होने वाली अकेली महिला थीं।
इसके दो दशक बाद, वर्ष 1992 में रोज मिलियन बाथेव खारबुली UPSC की पहली महिला अध्यक्ष बनीं। इन घटनाओं को महिला प्रतिनिधित्व के लिहाज से आयोग की संस्थागत यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ावों के रूप में देखा जा सकता है।
आवेदन प्रक्रिया में भी समय-समय पर व्यावहारिक बदलाव किए गए। वर्ष 1989 में दूर-दराज के क्षेत्रों तक आवेदन पत्र पहुंचाने में डाक सेवा की धीमी गति के कारण आयोग ने आवेदन पत्रों को सीधे अखबारों में प्रकाशित करवाया। इससे उन क्षेत्रों के उम्मीदवारों को सुविधा देने का प्रयास किया गया, जहां समय पर आवेदन पत्र पहुंचाना कठिन था।
वर्ष 1984 में भारी बर्फबारी के कारण हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा क्षेत्र का संपर्क कट गया था। उस दौरान प्रभावित उम्मीदवारों के लिए आवेदन की समय-सीमा दो सप्ताह बढ़ा दी गई थी। ये घटनाएं बताती हैं कि आयोग ने कुछ परिस्थितियों में उम्मीदवारों की व्यावहारिक समस्याओं को ध्यान में रखकर भी निर्णय लिए।
डाक टिकट पर सूरज और आयोग की स्वर्ण जयंती
वर्ष 1976 में आयोग की स्वर्ण जयंती के अवसर पर इसकी ऐतिहासिक यात्रा को विशेष रूप से चिह्नित किया गया। 8 नवंबर 1977 को डाक और तार विभाग ने 25 पैसे का एक डाक टिकट जारी किया। इस टिकट पर सूरज का चित्र बनाया गया था, जिसे निष्पक्षता और सभी के लिए समान अवसर का प्रतीक बताया गया। इसके साथ राष्ट्रीय तिरंगे को भी स्थान दिया गया था।
बाद में 14 दिसंबर 2001 को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने आयोग की प्लेटिनम जयंती से संबंधित कार्यक्रम की शुरुआत की। इस अवसर पर डाक विभाग की ओर से विशेष फर्स्ट डे कवर भी जारी किया गया।
आयोग का इतिहास आम जनता तक पहुंचाने के लिए 11 नवंबर 2016 को यूपीएससी संग्रहालय खोला गया। यह संग्रहालय आम लोगों के लिए निःशुल्क है और सप्ताह के कार्यदिवसों में सुबह 9:30 बजे से शाम 6:30 बजे तक खुला रहता है। आयोग की वेबसाइट पर इसका 360 डिग्री वर्चुअल टूर भी उपलब्ध कराया गया है।
उम्र सीमा और अवसरों में बदलाव
सिविल सेवा परीक्षा में शामिल होने की उम्र सीमा भी समय के साथ बदलती रही है। वर्ष 1988 में एक विशेषज्ञ समिति ने सिविल सेवा परीक्षा के लिए 21 से 26 वर्ष की उम्र सीमा निर्धारित करने की सिफारिश की थी। बाद के वर्षों में उम्मीदवारों के लिए अधिकतम उम्र और प्रयासों की संख्या में बदलाव किए गए।
वर्ष 2014 में सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए अधिकतम उम्र सीमा 32 वर्ष, ओबीसी के लिए 35 वर्ष और एससी तथा एसटी उम्मीदवारों के लिए 37 वर्ष निर्धारित की गई। दिव्यांग उम्मीदवारों को अधिकतम दस वर्ष तक की उम्र में छूट और दो अतिरिक्त प्रयासों की सुविधा का भी उल्लेख किया गया।
इसके अतिरिक्त सिविल सेवा परीक्षा 2011 में शामिल हुए उम्मीदवारों को 2015 की परीक्षा में एक अतिरिक्त प्रयास का अवसर दिया गया था। इस सुविधा में उम्मीदवार की उम्र और पहले दिए गए प्रयासों की संख्या को बाधा नहीं बनाया गया था।
आयोग ने कुछ विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों से प्रभावित उम्मीदवारों के लिए भी उम्र संबंधी रियायतें दी हैं। इनमें गोवा मुक्ति संग्राम 1961-62 के स्वतंत्रता सेनानी, बांग्लादेश मुक्ति युद्ध तथा युगांडा और जंजीबार संकट के कारण विस्थापित भारतीय और खाड़ी युद्ध 1991 से प्रभावित भारतीय शामिल रहे हैं।
इन प्रावधानों का उद्देश्य उन उम्मीदवारों को अतिरिक्त अवसर देना था, जिनकी शिक्षा या परीक्षा की तैयारी उनके नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण प्रभावित हुई थी।
आयोग का कार्यक्षेत्र केवल केंद्र सरकार तक सीमित नहीं
UPSC का कार्यक्षेत्र हमेशा से केवल केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों तक सीमित नहीं रहा है। वर्ष 1960-61 में संविधान के अनुच्छेद 320 के तहत आयोग ने दिल्ली नगर निगम, कर्मचारी राज्य बीमा निगम और केंद्र शासित प्रदेशों की क्षेत्रीय परिषदों जैसी संस्थाओं के लिए भी भर्ती करने पर सहमति जताई थी।
यह तथ्य आयोग की उस भूमिका को स्पष्ट करता है, जिसमें विभिन्न सार्वजनिक संस्थानों को योग्य कर्मचारी उपलब्ध कराने के लिए उसकी विशेषज्ञता का उपयोग किया गया। हालांकि, समय के साथ अलग-अलग संस्थाओं की भर्ती व्यवस्था और आयोग की भागीदारी में परिवर्तन होते रहे हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध में बंद हुई खुली प्रतियोगिता
UPSC की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में द्वितीय विश्व युद्ध का दौर भी महत्वपूर्ण है। युद्ध के कारण इंडियन सिविल सर्विस की खुली प्रतियोगी परीक्षा की व्यवस्था प्रभावित हुई। लंदन में परीक्षा आखिरी बार 1939 में आयोजित की गई थी। इसके बाद 1940, 1941 और 1942 में अधिकारियों की नियुक्ति सीधे नामांकन के माध्यम से हुई। वर्ष 1943 के बाद ब्रिटिश सिविल सेवा आयोग के माध्यम से भर्ती भी पूरी तरह बंद हो गई।
यह दौर दिखाता है कि प्रतियोगी परीक्षा जैसी संस्थागत व्यवस्था भी तत्कालीन राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से प्रभावित हो सकती थी। स्वतंत्र भारत में संवैधानिक संरक्षण के पीछे एक उद्देश्य स्थायी और स्वतंत्र भर्ती व्यवस्था स्थापित करना भी रहा।
संविधान निर्माण के दौरान लोक सेवा आयोग से जुड़े प्रावधानों को शुरुआत में अनुच्छेद 284 और 285 के रूप में रखा गया था। बाद में संविधान के अंतिम स्वरूप में इन्हें भाग XIV के अनुच्छेद 315 से 323 के अंतर्गत स्थान दिया गया।
परीक्षा व्यवस्था के पीछे की कार्यप्रणाली: सही प्रश्नपत्र, सही उम्मीदवार तक
यूपीएससी की परीक्षा प्रक्रिया केवल प्रश्नपत्र तैयार करने और परीक्षा आयोजित करने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे उम्मीदवारों की पहचान, परीक्षा केंद्रों का आवंटन, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता और उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन से जुड़ी एक विस्तृत व्यवस्था काम करती है।
इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए मुंबई के डब्बावालों की व्यवस्था से तुलना की जा सकती है। लगभग 5,000 डब्बावाले हर सुबह घरों से भोजन इकट्ठा करते हैं और उसे दोपहर तक सही व्यक्ति और सही स्थान पर पहुंचाते हैं। वे इसके लिए सीमित संकेतों और रंगों का इस्तेमाल करते हैं। यूपीएससी के सामने भी कुछ इसी तरह की समन्वय संबंधी चुनौती होती है, लेकिन यहां प्रश्नपत्रों की गोपनीयता और लाखों उम्मीदवारों के भविष्य का सवाल जुड़ा होता है।
परीक्षा के दौरान प्रत्येक उम्मीदवार को सही प्रश्नपत्र उपलब्ध कराना और उसकी उत्तर पुस्तिका का निष्पक्ष मूल्यांकन करना इस व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
परीक्षा केंद्र और प्रश्नपत्रों का आवंटन
परीक्षा केंद्र के आवंटन की प्रक्रिया में उम्मीदवार सबसे पहले अपना शहर चुनता है। इसके बाद उसी शहर में परीक्षा केंद्र और कक्ष का आवंटन आयोग की व्यवस्था के तहत किया जाता है। परीक्षा से पहले प्रत्येक उम्मीदवार के लिए शहर, केंद्र, कक्ष और उम्मीदवार की पहचान से संबंधित एक विशिष्ट विवरण तैयार होता है, जिसकी जानकारी पहले केवल संबंधित प्रणाली के पास रहती है।
सिविल सेवा मुख्य परीक्षा में उम्मीदवार 48 वैकल्पिक विषयों में से अपना विषय चुन सकते हैं। ऐसे में एक ही परीक्षा कक्ष में बैठे उम्मीदवार अलग-अलग विषयों के प्रश्नपत्र लिख सकते हैं। इसलिए प्रत्येक सीलबंद पैकेट में संबंधित केंद्र और कक्ष के लिए आवश्यक प्रश्नपत्रों का होना जरूरी है। प्रश्नपत्रों के वितरण में इस स्तर का समन्वय परीक्षा संचालन की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
प्रश्नपत्र तैयार करने में गोपनीयता का महत्व
यूपीएससी के प्रश्नपत्र शैक्षणिक विशेषज्ञों द्वारा तैयार किए गए प्रश्न बैंकों के आधार पर बनाए जाते हैं। इन विशेषज्ञों की पहचान गोपनीय रखी जाती है और पूरी प्रक्रिया में किसी एक व्यक्ति को संपूर्ण प्रश्नपत्र की जानकारी नहीं दी जाती।
प्रश्नपत्र तैयार करते समय पाठ्यक्रम के सभी महत्वपूर्ण हिस्सों को शामिल करने, प्रश्नों के कठिनाई स्तर में संतुलन बनाए रखने और पहले की परीक्षाओं में पूछे जा चुके सवालों की पुनरावृत्ति से बचने का प्रयास किया जाता है।
इस प्रक्रिया में जरूरत के अनुसार जानकारी उपलब्ध कराने का सिद्धांत अपनाया जाता है। इसका अर्थ है कि किसी भी एक व्यक्ति को पूरी प्रक्रिया से संबंधित सारी जानकारी नहीं दी जाती। यहां तक कि आयोग के अध्यक्ष को भी प्रत्येक प्रश्नपत्र के सभी विवरणों की जानकारी होना आवश्यक नहीं है। इसका उद्देश्य गोपनीयता और परीक्षा की निष्पक्षता बनाए रखना है।
एआई आधारित चेहरे की पहचान से परीक्षा सुरक्षा
परीक्षा केंद्रों पर उम्मीदवारों की पहचान सत्यापित करने के लिए आयोग ने तकनीक का भी इस्तेमाल शुरू किया है। राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस डिवीजन के साथ मिलकर 14 सितंबर 2025 को एनडीए एवं एनए (II) और सीडीएस (II) परीक्षाओं के दौरान गुरुग्राम के कुछ चयनित केंद्रों पर एआई आधारित चेहरे के सत्यापन का पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया।
इस व्यवस्था में परीक्षा केंद्र पर उम्मीदवार की लाइव तस्वीर का उसके आवेदन पत्र में उपलब्ध तस्वीर से मिलान किया गया। बाद में 24 मई 2026 को आयोजित सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में इस तकनीक का व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किया गया। इस दौरान लगभग 5.50 लाख उम्मीदवारों का चेहरे के माध्यम से सत्यापन किया गया। प्रत्येक उम्मीदवार के सत्यापन में लगभग छह से आठ सेकंड का समय लगा।
इसके अतिरिक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2026 से पहले उम्मीदवारों के पिछले 15 वर्षों के आंकड़ों की जांच की गई। इस प्रक्रिया में 569 ऐसे आवेदकों की पहचान की गई, जिन्होंने अतिरिक्त प्रयास प्राप्त करने के लिए कथित तौर पर गलत जानकारी दी थी। आयोग ने इन आवेदनों को अस्वीकार किया।
यह व्यवस्था परीक्षा में अनुचित तरीके से शामिल होने की कोशिशों को रोकने के लिए तकनीकी और प्रशासनिक उपायों के बढ़ते इस्तेमाल को दर्शाती है। साथ ही, ऐसे उपायों में डेटा की सुरक्षा और उम्मीदवारों के अधिकारों का ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है।
जरूरत के समय भर्ती प्रक्रिया में तेजी
देश की प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी जरूरतों के अनुसार यूपीएससी ने अलग-अलग समय पर विशेष भर्ती प्रक्रियाएं भी संचालित की हैं। जुलाई 1948 में एक विशेष भर्ती बोर्ड के माध्यम से 27 से 45 वर्ष की आयु के अनुभवी लोगों को रिकॉर्ड और साक्षात्कार के आधार पर आईएएस और आईपीएस में भर्ती किया गया।
वर्ष 1956-57 में एक विशेष अभियान चलाकर 22,000 से अधिक उम्मीदवारों की स्क्रीनिंग की गई। वर्ष 1958 में एक विशेष भर्ती बोर्ड ने राष्ट्रीय पूल के लिए 197 वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकीविदों का चयन किया। इनमें विदेश से आए उम्मीदवार भी शामिल थे। वर्ष 1962 तक इस पूल में चयनित लोगों की संख्या बढ़कर 500 हो गई।
वर्ष 1962 की आपातकालीन परिस्थितियों के दौरान एक आपात आयोग ने केवल दो महीनों में रक्षा से जुड़े 1,353 पदों को भरा। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि विशेष परिस्थितियों में प्रशासनिक और तकनीकी जरूरतों को पूरा करने के लिए भर्ती प्रक्रिया को अलग स्वरूप भी दिया गया।
कोविड-19 महामारी के दौरान भी आयोग को भर्ती प्रक्रिया जारी रखने में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। ट्रेन सेवाएं बंद होने के कारण साक्षात्कार के लिए आने वाले उम्मीदवारों को परेशानी हुई। इस दौरान आयोग ने एक बार के विशेष उपाय के रूप में साक्षात्कार देने वाले उम्मीदवारों का हवाई किराया वापस किया। राज्यों से ई-समन पत्र वाले उम्मीदवारों को प्रतिबंधित क्षेत्रों से गुजरने की अनुमति देने का अनुरोध किया गया। उम्मीदवारों के रहने और परिवहन में भी मदद की गई।
इसके अलावा परीक्षा और साक्षात्कार में शामिल होने वाले उम्मीदवारों को मास्क, फेस शील्ड, सैनिटाइजर और दस्ताने वाली सीलबंद किट उपलब्ध कराई गई। इन उपायों का उद्देश्य महामारी के दौरान भी भर्ती प्रक्रिया को जारी रखना और उम्मीदवारों की सुरक्षा का ध्यान रखना था।
समावेशी व्यवस्था: दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए सुविधाएं
यूपीएससी की समावेशिता संबंधी पहलों में दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए उपलब्ध कराई गई सुविधाओं का विशेष महत्व है। वर्ष 1994 में दृष्टिबाधित उम्मीदवारों के लिए स्क्राइब की सुविधा शुरू की गई थी। इसके बाद समय के साथ पात्र दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए अतिरिक्त समय और अन्य सुविधाओं का विस्तार हुआ।
वर्तमान व्यवस्था के तहत पात्र बेंचमार्क दिव्यांग उम्मीदवारों को स्क्राइब और अतिरिक्त समय की सुविधा दी जाती है। उन्हें अपनी पसंद का परीक्षा केंद्र चुनने का विकल्प भी मिलता है। जरूरत के अनुसार वे अपने साथ सहायक ला सकते हैं और साक्षात्कार के दौरान फैसिलिटेटर की सहायता भी प्राप्त कर सकते हैं।
इसके अतिरिक्त महिला उम्मीदवारों को परीक्षा शुल्क में छूट दी जाती है। कुछ विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों और युद्ध या विस्थापन से प्रभावित उम्मीदवारों के लिए उम्र संबंधी रियायतों का प्रावधान भी रहा है।
निष्पक्षता के लिए लिखित परीक्षा से लेकर साक्षात्कार तक ऐसी मूल्यांकन व्यवस्था अपनाने का उद्देश्य रखा गया है, जिसमें उम्मीदवार की पहचान का अनुचित प्रभाव न पड़े। आयोग स्वयं आरक्षण नीति निर्धारित नहीं करता, लेकिन भर्ती प्रक्रिया में निर्धारित आरक्षण प्रावधानों को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सिविल सेवा परीक्षा 2019 से आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस श्रेणी को शामिल किया गया। वहीं 2020 से ऑनलाइन रिक्रूटमेंट एप्लीकेशन फॉर्म में ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों के लिए अलग श्रेणी की व्यवस्था की गई। इन बदलावों ने भर्ती प्रक्रिया में विभिन्न सामाजिक वर्गों की भागीदारी से जुड़े नए आयाम जोड़े।
अंतिम मेरिट सूची से बाहर उम्मीदवारों के लिए प्रतिभा सेतु
यूपीएससी की एक महत्वपूर्ण पहल उन उम्मीदवारों के लिए भी है, जो परीक्षा के सभी चरणों में सफल होने के बावजूद अंतिम चयन सूची में जगह नहीं बना पाते। ऐसे कई उम्मीदवार होते हैं, जो निर्धारित मानकों के अनुरूप प्रदर्शन करते हैं, लेकिन उपलब्ध पदों और अंतिम मेरिट सूची के कारण चयनित नहीं हो पाते।
ऐसे उम्मीदवारों के लिए 20 अगस्त 2018 को सार्वजनिक प्रकटीकरण योजना शुरू की गई थी। इस योजना का पहला इस्तेमाल संयुक्त चिकित्सा सेवा परीक्षा 2017 के लिए किया गया। इसके तहत इच्छुक उम्मीदवारों की जानकारी संभावित नियोक्ताओं को उपलब्ध कराई जाती थी, ताकि उन्हें अन्य रोजगार अवसरों से जोड़ा जा सके।
9 जून 2025 को इसी योजना को नए स्वरूप में प्रतिभा सेतु नाम से शुरू किया गया। इसके माध्यम से उम्मीदवारों को सत्यापित नियोक्ताओं से जोड़ने की व्यवस्था की गई है। इसमें मंत्रालयों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, स्वायत्त संस्थाओं और निजी संगठनों को भी शामिल किया गया है।
यह पहल इस विचार पर आधारित है कि किसी एक परीक्षा की अंतिम सूची में जगह नहीं बना पाना किसी उम्मीदवार की पूरी योग्यता का अंतिम आकलन नहीं है। हालांकि, योजना की वास्तविक उपयोगिता इस बात से भी तय होगी कि कितने उम्मीदवारों को इसके माध्यम से उपयुक्त रोजगार के अवसर मिल पाते हैं।
2025 और 2026 में आयोग की नई पहलें
यूपीएससी की शताब्दी के आसपास आयोग ने अपनी भर्ती प्रणाली को आधुनिक बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। मई 2025 में यूनिवर्सल रजिस्ट्रेशन नंबर की व्यवस्था की घोषणा की गई। upsconline.nic.in पर विकसित नए पोर्टल के माध्यम से पुरानी वन-टाइम रजिस्ट्रेशन व्यवस्था को बदलने और सभी परीक्षाओं के लिए एक स्थायी पहचान उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई। इसके तहत उम्मीदवार अपनी प्रोफाइल पहले से पूरी कर सकते हैं और विभिन्न परीक्षाओं के लिए एक ही स्थायी पहचान का इस्तेमाल कर सकते हैं।
वर्ष 2025 में संयुक्त चिकित्सा सेवा परीक्षा के लिए साक्षात्कार बोर्डों का चयन यादृच्छिक तरीके से करने की व्यवस्था शुरू की गई। इसमें सॉफ्टवेयर के माध्यम से साक्षात्कार के लिए उम्मीदवारों को बुलाने का क्रम तय किया जाता है। इसका उद्देश्य साक्षात्कार प्रक्रिया में एक व्यवस्थित और पूर्वनिर्धारित प्रक्रिया अपनाना है।
इसी वर्ष आयोग ने शैक्षणिक और व्यावसायिक संस्थानों के लिए ईमेल अलर्ट की सुविधा भी शुरू की। इच्छुक संस्थान ra-upsc@gov.in पर अनुरोध भेजकर भर्ती संबंधी विज्ञापनों के अलर्ट प्राप्त करने के लिए पंजीकरण कर सकते हैं।
1 फरवरी 2026 से उम्मीदवारों के लिए 30 चैनल वाला आईपी आधारित हेल्पडेस्क शुरू किया गया, जिसमें शिकायतों के निस्तारण के लिए दो स्तरों की एस्केलेशन व्यवस्था है। इस हेल्पडेस्क के माध्यम से 50,000 से अधिक कॉल संभाले जाने की जानकारी दी गई है।
परीक्षा केंद्रों के विस्तार की दिशा में भी कदम उठाए गए। सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2026 के लिए भुवनेश्वर, कानपुर और मेरठ को नए केंद्रों के रूप में शामिल किया गया। इन केंद्रों पर क्रमशः 10,656, 6,938 और 5,902 आवेदन प्राप्त हुए। इससे परीक्षा केंद्रों की संख्या 80 से बढ़कर 83 हो गई। एनडीए और एनए (II) परीक्षा 2026 के लिए अलवर, हिसार और किन्नौर को भी नए केंद्रों के रूप में शामिल किया गया।
वर्ष 2026 में सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के तुरंत बाद प्रोविजनल आंसर की जारी करने की व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया है। इसके लिए ऑनलाइन ओपीआरईपी यानी QPRep पोर्टल के माध्यम से उम्मीदवारों को प्रश्नों पर आपत्ति और सुझाव देने की सुविधा दी गई।
प्रशासनिक कार्यों को डिजिटल बनाने के लिए लगभग 101 मंत्रालयों, विभागों और संगठनों के विभागीय पदोन्नति समिति यानी डीपीसी प्रस्तावों के लिए ऑनलाइन पेपरलेस प्रणाली विकसित की जा रही है। इसके साथ ही एनआईईएलआईटी के माध्यम से अधिकारियों को एआई समेत नई तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया है। सूचना प्रौद्योगिकी के बुनियादी ढांचे और साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के लिए उच्चस्तरीय नेटवर्क समिति भी गठित की गई है।
ये पहलें बताती हैं कि आयोग परीक्षा आयोजन के साथ-साथ अपने प्रशासनिक कामकाज में भी तकनीकी बदलाव लाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
आज का आयोग: नेतृत्व और संस्थागत संरचना
UPSC की शताब्दी के समय आयोग के अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार हैं, जिन्होंने 15 मई 2025 को पदभार संभाला था। आयोग में उनके अतिरिक्त आठ सदस्य हैं। इनमें लेफ्टिनेंट जनरल राज शुक्ला (सेवानिवृत्त), सुमन शर्मा, विद्युत बिहारी स्वैन, डॉ. दिनेश दासा, शील वर्धन सिंह, संजय वर्मा, सुजाता चतुर्वेदी और अनुराधा प्रसाद शामिल हैं।
इन आठ सदस्यों में तीन महिलाएं हैं। आयोग की वर्तमान संरचना और उसके पिछले सौ वर्षों के इतिहास की तुलना करने पर सदस्यता तथा नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी में हुए बदलाव भी सामने आते हैं।
आयोग के अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार ने शताब्दी के अवसर पर संस्था के विकास को लेकर कहा है, “कोई संस्था जो सौ सालों से कायम है, वह इसलिए नहीं कि वह बदलाव का विरोध करती है, बल्कि इसलिए कि वह जानती है कि क्या कभी नहीं बदलना चाहिए।”
यह कथन आयोग की संस्थागत यात्रा में निरंतरता और बदलाव, दोनों के महत्व को रेखांकित करता है।
सौ साल की उपलब्धियों के बीच भविष्य की चुनौतियां
UPSC की सौ साल की यात्रा को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि संस्था ने समय के साथ अपनी संरचना, परीक्षा प्रणाली और कार्यक्षेत्र में कई बदलाव किए हैं। 1926 में स्थापित सीमित अधिकारों वाले आयोग से लेकर आज की संवैधानिक संस्था तक का सफर भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में आए व्यापक परिवर्तनों से जुड़ा हुआ है।
एक ओर आयोग ने भर्ती प्रक्रिया में प्रतियोगिता, गोपनीयता और संस्थागत स्वतंत्रता को महत्व दिया है, तो दूसरी ओर महिलाओं, दिव्यांग उम्मीदवारों और विभिन्न सामाजिक वर्गों की भागीदारी बढ़ाने के लिए भी कई व्यवस्थाएं विकसित हुई हैं। भारतीय भाषाओं में साक्षात्कार, परीक्षा केंद्रों का विस्तार, डिजिटल आवेदन, ऑनलाइन सहायता और प्रतिभा सेतु जैसी पहलें इस दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।
लेकिन इन उपलब्धियों के साथ कुछ चुनौतियां भी बनी हुई हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेने वाले उम्मीदवारों की बढ़ती संख्या के बीच परीक्षा का निष्पक्ष संचालन, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता और समयबद्ध परिणाम सुनिश्चित करना आयोग के लिए महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं। तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर सुरक्षा, डेटा संरक्षण और डिजिटल सुविधाओं तक समान पहुंच जैसे मुद्दों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
इसके अलावा, ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों के लिए तैयारी के संसाधनों की उपलब्धता, भाषाई बाधाओं और परीक्षा से संबंधित सूचनाओं तक समान पहुंच जैसे प्रश्न भी व्यापक चर्चा का हिस्सा हैं। चयनित उम्मीदवारों की संख्या में वृद्धि अपने आप में यह साबित नहीं करती कि हर वर्ग के युवाओं को तैयारी और प्रतियोगिता में समान अवसर मिल रहे हैं।
इसी तरह योग्यता आधारित चयन के साथ सामाजिक न्याय और संवैधानिक आरक्षण का संतुलन बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है। आयोग की भूमिका निर्धारित नियमों के अनुरूप निष्पक्ष चयन सुनिश्चित करने की है, जबकि भर्ती व्यवस्था की व्यापक नीतिगत दिशा संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों से निर्धारित होती है।
भविष्य में आयोग के सामने एक अन्य चुनौती यह भी होगी कि उसकी चयन प्रक्रिया प्रशासनिक सेवाओं के लिए आवश्यक ज्ञान के साथ-साथ निर्णय लेने की क्षमता, संवैधानिक समझ, नैतिकता और सार्वजनिक जवाबदेही जैसे गुणों के आकलन को किस तरह संतुलित करती है।
एक सदी का सफर और आने वाले सौ वर्षों की कसौटी
एक अक्टूबर 1926 को शुरू हुई UPSC की संस्थागत यात्रा एक अक्टूबर 2026 को सौ वर्ष पूरे कर रही है। इन सौ वर्षों में भारत ने औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र लोकतंत्र तक का सफर तय किया है। इसी अवधि में प्रशासनिक सेवाओं की संरचना बदली, भर्ती के तरीके विकसित हुए और लाखों युवाओं के लिए सरकारी सेवाओं में प्रवेश के नए अवसर सामने आए।
इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि जिस परीक्षा व्यवस्था में कभी भारतीयों की भागीदारी बेहद सीमित थी, आज उसमें देश के अलग-अलग हिस्सों से लाखों उम्मीदवार शामिल होते हैं। महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और दिव्यांग उम्मीदवारों की बढ़ती भागीदारी भी इस परिवर्तन का हिस्सा है। वहीं डिजिटल तकनीक और नई भर्ती पहलों ने आयोग के कामकाज को पहले की तुलना में अधिक व्यापक बना दिया है।
फिर भी, किसी भी संवैधानिक संस्था की प्रासंगिकता केवल उसके इतिहास और उपलब्धियों से तय नहीं होती। उसकी विश्वसनीयता इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह वर्तमान चुनौतियों का सामना कितनी निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ करती है।
UPSC की शताब्दी केवल अतीत की उपलब्धियों को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर विचार करने का भी समय है, जिसके माध्यम से देश अपने प्रशासनिक नेतृत्व का चयन करता है। एक सदी पहले भारतीयों के सामने उच्च प्रशासनिक सेवाओं में प्रवेश का अधिकार हासिल करने की चुनौती थी। आज चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि योग्यता रखने वाले प्रत्येक भारतीय को अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि, भाषा, स्थान और आर्थिक परिस्थितियों से परे निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा का वास्तविक अवसर मिल सके।
UPSC के अगले सौ वर्षों की दिशा इस बात से भी तय होगी कि वह अपनी संवैधानिक स्वतंत्रता और योग्यता आधारित चयन की मूल भावना को बनाए रखते हुए बदलते भारत की जरूरतों के अनुरूप खुद को किस तरह विकसित करता है।
Source- PIB
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