₹1 में ज़मीन, ₹3500 में अंतिम संस्कार? बिहार सरकार के फैसलों पर उठे गंभीर सवाल

 

पटना :- बिहार के सरकार के हालिया फैसलों ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी बहस छेड़ दी है। राज्य कैबिनेट ने मुंगेर जिले के तारापुर स्थित तेलडीहा में 15 एकड़ की जिस जमीन को ₹2.64 करोड़ की राशि खर्च करके अधिग्रहित किया था। उसे ईशा फाउंडेशन के मालिक सद्गुरु जग्गी वासुदेव को महज ₹1 प्रति एकड़ की दर से 99 साल की लीज पर आवंटित कर दिया है।
सरकार का तर्क है कि इस कदम से क्षेत्र में पर्यटन, योग और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। लेकिन विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल इसे “सार्वजनिक संसाधनों का सस्ते में निजीकरण” करार दे रहा है।

विपक्ष का कहना है – पटना के बांस घाट पर लगभग ₹89 करोड़ की लागत से बने आधुनिक इलेक्ट्रिक शवदाह गृह का संचालन भी ईशा फाउंडेशन को सौंपा गया है। यह जिम्मेदारी भी महज ₹1 की लीज पर दी गई है, जिसके बाद अंतिम संस्कार की शुल्क में भारी वृद्धि हुई है। जब श्मशान का संचालन सरकार कर रही थी, तब शुल्क ₹300 थी, और जब इसका प्रबंधन ईशा फाउंडेशन को सौंप दिया गया तो इसका न्यूनतम शुल्क ₹3500 – ₹5000 हो गया है। जिसमें लकड़ी या गैस का खर्च अलग से है।
शुल्क में करीब 12 गुना की वृद्धि, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों पर अतिरिक्त बोझ डालने वाला कदम बताया गया है।

सद्गुरु और मुख्यमंत्री के मुलाकात से बढ़ी चर्चा

जग्गी वासुदेव ने शुक्रवार को बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से उनके लोक सेवक आवास में आत्मीय मुलाकात की। यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब राज्य में ईशा फाउंडेशन को दी गई जमीन और श्मशान प्रबंधन को लेकर विवाद तेज है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस मुलाकात ने पूरे मुद्दे को और अधिक सियासी रंग दे दिया है, भले ही इसे आध्यात्मिक और औपचारिक भेंट बताया जा रहा हो।

मुंगेर की ऐतिहासिक पहचान बनाम नई पहल

मुंगेर पहले से ही योग की वैश्विक पहचान रखने वाला क्षेत्र है, जहां योग विश्व विद्यालय जैसी प्रतिष्ठित संस्था कई दशकों से कार्यरत है। इस पर राजद का भी सवाल है कि – जब पहले से ही विश्वस्तरीय योग संस्थान मौजूद है, तो सरकार उसी के आसपास बुनियादी ढांचा विकसित करने के बजाय बाहरी संस्था को जमीन क्यों दे रही है?

विपक्ष इसे स्थानीय विरासत की अनदेखी और बाहरी संस्थाओं को प्राथमिकता देने का मामला बताते हुए सत्ता से सवाल कर रहा है।
* क्या सार्वजनिक संपत्ति का इतने कम मूल्य पर दीर्घकालिक लीज पर देना उचित है?
* सरकार निजी प्रबंधन से आम जनता पर आर्थिक बोझ क्यों बढ़ा रही है?
* स्थानीय संस्थानों की अनदेखी कर बाहरी संगठनों को बढ़ावा क्यों?
जहां सरकार इसे विकास और निवेश आकर्षित करने की रणनीति बता रही है, वहीं विपक्ष इसे “नीतिगत पक्षपात” और ‘जनहित की अनदेखी’ के रूप में पेश कर रहा है।

मुंगेर की जमीन आवंटन और पटना के बांस घाट प्रबंधन का मुद्दा अब सिर्फ एक प्रशासनिक निर्णय नहीं रह गया है, बल्कि यह पारदर्शिता, जनहित और राज्य की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा बड़ा राजनीतिक प्रश्न बनता जा रहा है। सद्गुरु और मुख्यमंत्री की हालिया मुलाकात ने इस बहस को और तीखा बना दिया है। अब देखना होगा कि सरकार इन आरोपों का क्या जवाब देती है और क्या इन फैसलों की समीक्षा की जाती है या नहीं।

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