पटना:- बिहार की प्राचीन राजधानी पाटलिपुत्र, राजनीति, लोकतन्त्र और ज्ञान का केंद्र रहा है। भारत को पहला सम्राट देने वाला यह राज्य इस समय एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है, जहां बेहतर कार्य कुशलता का प्रदर्शन, जातीय समीकरण और वैचारिक प्रतिबद्धता – तीनों के बीच टकराव साफ दिख रहा है। सम्राट बनाम विजय चौधरी के राजनीतिक भविष्य को लेकर उठ रहे सवाल इसी बड़े बदलाव की ओर इशारा करते हैं।
एक तरफ विजय सिन्हा हैं, जिन्होंने सम्राट चौधरी के साथ उपमुख्यमंत्री, मंत्री रहते हुए भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ खुलकर लड़ाई लड़ी और प्रशासनिक स्तर पर अपनी मजबूत छवि बनाई। दूसरी तरफ सम्राट चौधरी हैं, जिनका उभार यह संकेत देता है कि आज की राजनीति में केवल काम ही नहीं, बल्कि जातीय और राजनीतिक उपयोगिता भी निर्णायक हो चुकी है।
संघ पृष्ठभूमि का अभाव: परंपरा से अलग फैसला?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और उसके आनुषंगिक संगठनों से जुड़े नेताओं को प्राथमिकता देना भारतीय जनता पार्टी की लंबे समय से स्थापित परंपरा रही है। विजय सिन्हा बाल्यकाल से हीं स्वयंसेवक रहे हैं। वे अपने छात्र जीवन में भी RSS के स्टूडेंट विंग – अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (ABVP) में भी सक्रिय रहे हैं। लखीसराय विधानसभा से, फरवरी 2005 में वे पहली बार BJP के विधायक बने, लेकिन अक्टूबर 2005 में हीं हुए मध्यवर्ती चुनाव में वे राष्ट्रीय जनता दल के फुलैना सिंह से हार गए। पुनः वे 2010 के विधान सभा चुनाव में BJP की ओर से विधायक बनें और लगातार 5वीं बार वर्तमान में भी विधायक हैं। इस दौरान वे कई विभाग के मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष भी रहे।
लेकिन सम्राट चौधरी का मामला इस पैटर्न से बिल्कुल अलग नजर आता है। वे न तो संघ की पारंपरिक पृष्ठभूमि से आते हैं और न ही उन्हें कैडर-आधारित राजनीति का प्रतिनिधि चेहरा माना जाता रहा है। वे हमेशा दल बदल कर तो कभी, अपने पिता के राजनीतिक शाख पर राजनीति की है। उनका परिवारवाद के अलावा किसी विचारधारा से कोई वास्ता नहीं रहा। इसके बावजूद उनका तेजी से उभार और शीर्ष नेतृत्व की दौड़ में आना यह संकेत देता है कि BJP अब वैचारिक प्रतिबद्धता से ज्यादा चुनावी गणित और सामाजिक समीकरणों को प्राथमिकता दे रही है।
जातीय समीकरण बनाम परफॉर्मेंसः-
बिहार की राजनीति में जातीय संतुलन हमेशा से अहम रहा है, लेकिन हालिया घटनाक्रम यह दिखाते हैं कि यह अब पहले से भी ज्यादा निर्णायक हो गया है। विजय कुमार सिन्हा की प्रशासनिक सक्रियता और ईमानदार छवि के बावजूद, वे उस सामाजिक समीकरण में फिट नहीं बैठ पाए, जो सत्ता संतुलन तय करता है। वहीं सम्राट चौधरी को एक ऐसे चेहरे के रूप में देखा जा रहा है, जो खास जातीय आधार (कुशवाहा 4.21%) को मजबूती दे सकते हैं!
परन्तु बिहार में कुशवाहा नेता के तौर पर जितनी स्वीकार्यता उपेंद्र कुशवाहा की है, उतना सम्राट चौधरी की नहीं है। BJP उन्हें कुशवाहा नेता के तौर पर पेश करना चाहती है, जिससे आने वाले भविष्य में भाजपा को उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेताओं या उनके रालोमो, (राष्ट्रीय लोक मोर्चा) जैसे छोटे राजनीतिक दल की आवश्यकता न पड़े।
विवादों का साया और राजनीतिक आरोपः-
सम्राट चौधरी का नाम समय-समय पर विवादों में भी रहा है। तीन जन्मतिथि, शैक्षणिक योग्यता विवाद से लेकर अन्य राजनीतिक परन्तु गंभीर आरोपों तक, उनकी छवि पूरी तरह निर्विवाद नहीं रही है।
हाल ही में जन सुराज सुप्रीमो प्रशांत किशोर , JDu MLC नीरज कुमार, BJP पूर्व सांसद R.K. सिंह ने उन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने 1995 के तारापुर हत्याकांड का जिक्र करते हुए दावा किया कि इस मामले में सम्राट चौधरी 7 लोगों के हत्या के अभियुक्त रहे थे और उम्र संबंधी विवाद के कारण उन्हें राहत मिली।
इसके अलावा, शिल्पी गौतम रेप और मर्डर केस को लेकर भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप सामने आए हैं। हालांकि, इन मामलों में अब तक कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है, लेकिन इन आरोपों ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
BJP की राजनीति: सिद्धांत या सत्ता?
इन घटनाओं से एक बड़ा सवाल उभरता है – क्या BJP अपनी पारंपरिक वैचारिक राजनीति से हटकर अब पूरी तरह ‘विनिंग मॉडल’ पर आ गई है? बिहार में पहली बार पूर्ण रूप से BJP के मुख्यमंत्री बनने की संभावना के बीच, पार्टी ने ऐसे चेहरे को प्राथमिकता दी है जो जातीय समीकरणों में फिट बैठता हो और राजनीतिक रूप से आक्रामक हो?
यह बदलाव बताता है कि अब राजनीति में वैचारिक शुद्धता से ज्यादा महत्व जीतने की क्षमता और सामाजिक समीकरणों को साधने की कला का हो गया है।
निष्कर्ष: बदलती राजनीति का संकेतः-
पूरा घटनाक्रम यह दर्शाता है कि बिहार की राजनीति में अब तीन बड़े फैक्टर निर्णायक हैं-जाति, राजनीतिक उपयोगिता और सत्ता की रणनीति।
विजय कुमार सिन्हा का उदाहरण यह बताता है कि केवल काम, ईमानदारी और वैचारिक प्रतिबद्धता पर्याप्त नहीं हैं, जबकि सम्राट चौधरी का उभार यह संकेत देता है कि नई राजनीति में समीकरण और रणनीति ही असली ताकत बन चुके हैं।
अब देखने वाली बात यह होगी कि यह ‘नया मॉडल’ आने वाले समय में बिहार की राजनीति को किस दिशा में ले जाता है।
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