भारतीय संस्कृति की अनादि परंपरा में योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, अनुशासित और आध्यात्मिक ऊँचाइयों तक ले जाने वाली समग्र जीवन-पद्धति है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी योग-दर्शन को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करते हुए इसे विश्वकल्याण के आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया है। उनके सतत प्रयासों के परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय योग दिवस आज विश्वभर में मानव स्वास्थ्य, मानसिक शांति और सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक बन चुका है। योग के माध्यम से भारत ने एक बार पुनः विश्व को “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का संदेश दिया है
इसी वैश्विक योग-चेतना के आलोक में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली एवं संस्कृत अकादमी, दिल्ली सरकार के संयुक्त तत्वावधान में “स्वस्थ आयु के लिए योग” विषय पर अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का भव्य आयोजन संपन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने की, जिनके विद्वत्तापूर्ण नेतृत्व और सांस्कृतिक दृष्टिकोण ने आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की।
योग को जीवन का स्थायी संस्कार बनाएं युवा: प्रो. मुरलीमनोहर पाठक
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. पाठक ने कहा कि योग भारत की ऋषि- परंपरा का ऐसा अमूल्य उपहार है, जो मानव जीवन को शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और आत्मिक ऊर्जा प्रदान करता है। उन्होंने योग के इतिहास, उसके दार्शनिक आधार, वैज्ञानिक महत्व तथा व्यावहारिक उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्तमान समय की जटिल जीवनशैली, तनाव और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के बीच योग मानवता के लिए आशा का सबसे विश्वसनीय मार्ग बनकर उभरा है।
उन्होंने विद्यार्थियों और युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि योग को केवल एक दिवस का उत्सव न मानकर जीवन का स्थायी संस्कार बनाया जाए। उन्होंने संस्कृत और योग को भारतीय ज्ञान-परंपरा के दो ऐसे स्तंभ बताया जो मानवता को संतुलित और मूल्यनिष्ठ जीवन का मार्ग दिखाते हैं।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं स्वदेशी जागरण मंच के अखिल भारतीय सह-संगठन मंत्री श्री सतीश कुमार ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि योग दीर्घायु, निरोगी जीवन और स्वस्थ समाज की आधारशिला है। आज संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों सहित विश्व के अधिकांश राष्ट्र योग दिवस मना रहे हैं, जो भारत की सांस्कृतिक शक्ति और आध्यात्मिक विरासत की वैश्विक स्वीकृति का प्रमाण है। बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं और महँगी चिकित्सा व्यवस्था के युग में योग सबसे सरल, सुलभ और प्रभावी उपाय है।
‘स्वस्थ शरीर ही जीवन की वास्तविक पूँजी’, विभिन्न विचारकों ने रेखांकित किया योग का महत्व
कार्यक्रम में उपस्थित अन्य प्रबुद्ध वक्ताओं ने भी योग के विभिन्न आयामों पर अपनी बात रखी:
-
कुलसचिव प्रो. पवन कुमार शर्मा ने नियमित योगाभ्यास को स्वस्थ जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बताते हुए कहा कि यह व्यक्ति के व्यक्तित्व को संतुलित, सकारात्मक और अनुशासित बनाता है।
-
वित्त अधिकारी श्री संतोष कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि स्वस्थ शरीर ही जीवन की वास्तविक पूँजी है और योग इस अमूल्य पूँजी की सुरक्षा का सर्वोत्तम माध्यम है।
-
स्वामी सच्चिदानंद सरस्वती (गुरुकुल रावलधाम, बहरोड़) ने योग के आध्यात्मिक पक्ष को स्पष्ट करते हुए इसे आत्मानुशासन, संयम और आत्मबोध का मार्ग बताया।
-
प्रो. लक्ष्मी मिश्रा (दिल्ली विश्वविद्यालय) ने युवाओं को प्रेरणा देते हुए कहा कि नियमित योगाभ्यास से विद्यार्थियों की स्मरणशक्ति, एकाग्रता, मानसिक क्षमता और आत्मविश्वास में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
-
आचार्य योगेश कुमार (प्रधानाचार्य, गुरुकुल गौतम नगर) ने योग को भारतीय संस्कृति का प्राणतत्त्व बताया, वहीं निपुण (विजिटिंग फैकल्टी, राजस्थान विश्वविद्यालय) ने इसे विश्व समुदाय के लिए भारत की सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक देन कहा।
-
शैलजानंद मिश्र ने पतंजलि योगसूत्रों के महत्व को रेखांकित किया और आचार्य सुंदर शास्त्री ने अपनी सुमधुर भजन प्रस्तुति से उपस्थित जनसमूह को आध्यात्मिक अनुभूति कराई।
आयोजन की सफलता में इनका रहा विशेष योगदान
कार्यक्रम के आयोजक, छात्र कल्याण अधिष्ठाता एवं योग विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. मार्कण्डेय नाथ तिवारी ने अपने उद्बोधन में योग को जन-जन तक पहुँचाने को समय की आवश्यकता बताया। कार्यक्रम के सफल आयोजन में डॉ. हर्ष शुक्ला, प्रियंका पाण्डेय तथा कलावती आर्य का उल्लेखनीय योगदान रहा। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के सहायक अभियंता श्री अजनी कुमार राय सहित शिक्षकगण, अधिकारी, कर्मचारी, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
धन्यवाद ज्ञापन डॉ. हरि राम मीणा ने प्रस्तुत किया तथा कार्यक्रम का कुशल संचालन एवं संयोजन डॉ. रमेश कुमार ने प्रभावपूर्ण ढंग से संपन्न किया।
कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक के दूरदर्शी नेतृत्व में आयोजित यह भव्य कार्यक्रम इस सत्य को पुनः स्थापित करने में सफल रहा कि योग केवल भारत की विरासत नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के उज्ज्वल भविष्य का पथप्रदर्शक है।

