उपहार की राख से लखनऊ की लपटों तक…

लखनऊ– सन 1997 में यही जून का महिना था जब दिल्ली के मशहूर उपहार सिनेमा में बॉर्डर फिल्म लोगों के द्वारा  देखी जा रही थी , तभी अचानक से बेसमेंट में लगे इलेक्ट्रिक ट्रांसफॉर्मर में आग लग गई और देखते ही देखते पूरे सिनेमा हाल के अन्दर धुआँ भर गया था | इस अफरा तफरी में 59 लोगों की जान गई थी और साथ ही 100 से अधिक लोग घायल हुए थे ऐसा इसलिए हुआ था क्यूंकी उस सिनेमा हाल में निकास द्वार ही बंद थे और एमरजेन्सी लाइट काम ही नहीं कर रही थी |

अंसल बंधुओं ने सुरक्क्षा के सारे मानक को ताक पर रख दिया था विडम्बना यह थी कि जिनके सगे संबंधी इस दुर्घटना में अपनी जान गवाई उनके लिए भी न्याय मिलना आसान नहीं था | पीड़ित परिवारों ने एसोसिएशन ऑफ विक्टिम्स ऑफ उपहार ट्रैजडी बनाकर 23 वर्ष की एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी तब जाकर उन्हे न्याय मिला | विभिन्न जांच से यह पता चला कि उस सिनेमा हाल में न तो पर्याप्त अग्नि सुरक्षा थी और आपातकालीन दरवाजे भी अवरुद्ध थे साथ ही ट्रांन्स्फॉर्मर के रखरखाव में भी लापरवाही थी |

इस घटना के बाद विभिन्न सरकारों की नींद खुली और उन्होंने इस दुर्घटना को नजीर मानते हुए बहुत से मानकों का निर्धारण किया गया जैसे पर्याप्त आपातकालीन निकास , भवन की उचाई के अनुसार अग्निशमन की व्यवस्था की जाएगी , अग्निशामक यंत्र लगाए जाएंगे और फायर अलार्म लगाए जाएंगे ,एनओसी  लेना अनिवार्य किया जाएगा | लेकिन ये सारे दावे ढाक के तीन पात साबित हुए |

ऐसे में जब आज फिर लखनऊ के अलीगंज में जब आग लगने की त्रासदी होती है तो शासन प्रशासन का असली रूप सामने आता है| जब 15 मासूमों की जान गई तो इसके गुनहगारों को सजा मिलेगी भी या नहीं ये तो जांच के बाद ही पता चलेगा लेकिन पीड़ित परिवारों के दर्द महज मुआवजों से कम हो जाएगा | प्रथम दृष्ट्या मामला एनओसी न लेकर बनाये जाने की बात हो रही है लेकिन एक बात यह नहीं समझ मे आती है कि जब दुर्घटना घटित हो जाती है तब ये पता चलता है कि बिल्डिंग ने मानक का पालन नहीं किया | लेकिन इन नाकाम नगर निगम , फायर सर्विस विभाग और भवन के मालिक इतने लापरवाह हो जाते हैं कि इनको फर्क ही नहीं पड़ता कि कितनी आग लग रही , कितने लोग मर रहे | सोचने वाली बात तो यह है कि जब देश या राज्यों की राजधानी में सुरक्षा मानकों से खिलवाड़ किया जा रहा है तो बाकी अन्य बड़े शहरों में क्या स्थिति होगी |

जिम्मेदार अधिकारी प्रतिदिन उन्ही रास्तों से गुजरतें हैं वे सब देखते हैं कि कैसे बिजली के खंभों पर तारों का जंजाल लगा रहता है साथ ही अस्त व्यस्त भवनों का निर्माण हुआ रहता है लेकिन वे आंखे मूँदे रहते हैं | इन सबका मुख्य कारण उच्च स्तर से लेकर निचले स्तर तक विद्यमान भ्रष्टाचार और कुख्यात गठजोड़ होता है | सबका कमिशन तय होता है |

आखिर कैसे इन घटनाओ पर लगाम लगाई जाए कैसे देश के हुक्मरानों की जवाबदेही तय की जाए क्यूंकी दिक्कत यह है की देश की जनता को भूलने की बीमारी बहुत ज्यादा है , कुछ दिन सारे समाचार पत्र और न्यूज चैनल्स इसे दिखाएंगे फिर उन्हे कोई और मुद्दा मिल जाएगा लेकिन उन परिवारजनों का क्या जिनके सपने उनके बच्चों के साथ ही दफन हो गए | जरूरत है इन घटनाओ से सबक लेने की|

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