बेऊर जेल बना हैवानों का अड्डा: पैसे के खेल में रक्षक बने भक्षक

पटना :- बिहार के राजधानी स्थित बेऊर केंद्रीय कारा (जेल) में मानवता को शर्मसार कर देने वाला एक भयावह मामला सामने आया है, जहां जेल प्रशासन की मिलीभगत से कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार और गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन किए जा रहे थे। इस मामले में जेल अधीक्षक नीरज कुमार झा समेत सात अधिकारियों को गृह विभाग ने तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है।

यह कार्रवाई 20 जून 2026 को जिला प्रशासन और कारा निरीक्षणालय द्वारा की गई करीब आठ घंटे की औचक छापेमारी और जांच रिपोर्ट के बाद की गई। जांच में खुलासा हुआ कि जेल के भीतर एक ऐसा तंत्र विकसित हो चुका था, जहां कानून के रक्षक ही भक्षक बन बैठे थे।

नियमों की खुली अवहेलना

जेल मैनुअल के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद कम उम्र या पहली बार जेल आए विचाराधीन कैदियों और खूंखार अपराधियों को अलग रखने का नियम है। इस नियम की अवहेलना करते हुए कारा अधीक्षक ने जानबूझकर कमजोर, अल्पायु और विचाराधीन कैदियों को कुख्यात अपराधियों के साथ रखा। जेल प्रशासन के इस रवैए को देख कुख्यात अपराधियों नें अल्प समय के लिए हिरासत में लिये गए कैदियों जिनका मामला न्यायालयों में चल रहा है, उसे अपना शिकार बनाते थे।

जेल के अंदर -गिरोह का राज

रिपोर्ट के अनुसार, बैरकों में बंद युवा कैदियों से जबरन मालिश और निजी काम करवाया जाता था। विरोध करने पर उन्हें, डराया धमकाया एवं बेरहमी से पीटा जाता था। इतना ही नहीं, कुछ मामलों में यौन उत्पीड़न जैसी गंभीर घटनाएं भी सामने आई हैं, जिन्हें अधिकारियों ने नजरअंदाज किया।

पैसे के लिए – मानवता का सौदा

जेल प्रशासन और कुख्यात अपराधियों के बीच गठजोड़ की बात भी सामने आई है। पैसे लेकर अपराधियों को मोबाइल, बेहतर खाना और नशे की सुविधा दी जाती थी, जबकि असहाय नए कैदियों को बुनियादी सुविधाओं (जैसे हितधारकों/परिजनों से मिलना, एक दूसरे से बात चित करना, घर से आए खाने का सामान, अथवा जेल द्वारा उपलब्ध खाना) से भी वंचित रखा जाता था।

विरोध की सजा – मानसिक यातना

जो कैदी इस शोषण का विरोध करते थे या जिनके परिवार पैसे देने में असमर्थ थे, उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था। उन्हें अंधेरी कोठरियों में डालने, झूठे केस में फंसाने और यहां तक कि हत्या की धमकी दी जाती थी। इस वजह से कई कैदी गंभीर मानसिक तनाव और अवसाद का शिकार हो गए।

खाने में भी भ्रष्टाचार

जेल में तय मेन्यू के अनुसार भोजन नहीं दिया जा रहा था। खाने की गुणवत्ता इतनी खराब रखी जाती थी कि कैदी मजबूर होकर निजी मेस से महंगे दामों पर भोजन खरीदें। बाहर से मंगाई गई वस्तुएं भी मनमाने दामों पर बेची जाती थीं।

इन तमाम अत्याचारों के बाद सवाल उठता है कि क्या आरोपियों को उसके किए की सजा मिलेगी क्या आरोपी अधिकारियों की नौकरी जा सकती है? तो कानूनी जानकारों का कहना है हां, बिल्कुल – लेकिन इसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। फिलहाल सरकार ने नीरज कुमार झा सहित अन्य अधिकारियों को केवल निलंबित किया है, जो कि प्रारंभिक कार्रवाई होती है ताकि आरोपी अपने पद का दुरुपयोग कर जांच को प्रभावित न कर सकें।

इस मामले में लगे आरोप महज विभागीय लापरवाही तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गंभीर आपराधिक श्रेणी में आते हैं। ऐसे में इन अधिकारियों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) और अन्य विशेष कानूनों के तहत तुरंत FIR दर्ज किया जाना चाहिए।

– कैदियों से अवैध वसूली और ब्लैक मार्केटिंग के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला बनता है।
– किशोर और विचाराधीन कैदियों के शारीरिक व यौन उत्पीड़न को नजरअंदाज करना या बढ़ावा देना अत्यंत गंभीर अपराध है। इसके लिए पोक्सो एक्ट और BNS की संगीन धाराओं के तहत जेल अधीक्षक को सह-आरोपी या साजिशकर्ता बनाया जाना चाहिए।

FIR के समानांतर एक त्वरित विभागीय जांच भी जरूरी है। यदि जांच में आरोप पूरी तरह साबित हो जाते हैं, तो बिहार सरकारी सेवक नियमावली के तहत दोषी अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त किया जा सकता है या अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी जा सकती है, जिससे वे भविष्य में किसी भी सरकारी पद पर न रह सकें।

स्वतंत्र जांच की मांग

मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को स्वतः संज्ञान लेकर स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच करानी चाहिए, ताकि पीड़ितों को न्याय मिल सके और पूरे तंत्र की जवाबदेही तय हो।यह कांड केवल एक जेल की कहानी नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता का आईना है। यदि समय रहते सख्त आपराधिक कार्रवाई और संस्थागत सुधार नहीं हुए, तो ऐसे ‘नरक’ फिर बनते रहेंगे।

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